डॉक्टर के क्लिनिक से निकल कर मैं आगे बढ़ा। मेरे 88 वर्षीय पिताजी अपनी छड़ी टेकते हुए धीरे धीरे आगे जा रहे थे। मेरे हाथ में पिताजी की स्वास्थ्य संबंधी फाइल थी। अचानक एक 8-10 वर्षीय बालक दौड़ता हुए पिताजी के पास से निकला। कुछ कदम आगे दौड़ा फिर पिताजी के पास आकर बोला " दादू, मैं आपको बाहर तक छोड़ आऊं।" मैंने सुनी पिताजी की गर्व मिश्रित आवाज़ " नहीं, मेरा बेटा पीछे आ रहा है।" बच्चे ने मुड़कर मुझे देखा, मुस्कराया और फिर आगे दौड़ गया। मेरे अंदर से छनाक की आवाज़ आई आंखो में आंसू आ गए। मैंने पिताजी की फाइल खोली, एक पेपर निकाला और चिंदी चिंदी करके हवा में उछाल दिया । यह मैं क्या कर रहा हूं पिताजी के विश्वास को तोड़ रहा हूं इन चार शब्दों में ही उन्होंने पुत्र के प्रति अपने विश्वास को जता दिया और में उनके इसी विश्वास को तोड़ने जा रहा हूं। कदम तेजी से बढ़ाता हुए पिताजी के पास जाकर उन्हें छुआ। पिताजी ने देखा और अपना दूसरा हाथ मेरे कंधे पर रख दिया और हम दोनों आगे बढ़ गए।
ओह हो .. मैं बताना भूल गया कि जो पेपर मैंने फाड़कर हवा में उछाल दिया था वो एक वृद्धाश्रम का फॉर्म था जहां मैं दो दिनों के बाद उन्हें छोड़ने जा रहा था।
शिप्पी नारंग (लघुकथा के परिंदे)
नई दिल्ली
25/2/2021

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