मदन जी सुबह सुबह बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि तभी पत्नी, शारदा जी हाथ में अपना चाय का कप लेकर आईं और बैठ गईं। मदन जी ने अख़बार सामने से हटाया और पत्नी के चेहरे को देखते ही समझ गए फिर कुछ कहने का माहौल बनाया जा रहा है। पूछ ही लिया " क्या हुआ मुंह क्यों उतरा हुआ है?" शारदा जी इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी कि पतिदेव कुछ पूछें तो वो शुरू हो जाएं। "अरे देखो ना आजकल की बहुओं को संस्कार तो सीख कर ही नहीं आती हैं । चार महीने हो गए बहू को ऑफिस ज्वॉइन किए हुए। रोज़ ऑफिस जाती है, सैलेरी भी लाती होगी पर मजाल है कि एक बार भी सैलेरी मेरे हाथ में रखी हो या बोला हो कि मम्मी ये मेरी तनख्वाह है आप रख लीजिए। मैं कौन सा रख लेती पर ऐसा कह देती तो छोटी तो ना हो जाती और मेरा सम्मान भी रख लेती।" "तो तुम्हे क्या पैसे की कमी है अच्छी भली तुम्हारी पेंशन आती है मेरी पेंशन पर भी तुम्हारा पूरा हक है मकान के ऊपरी हिस्से का किराया भी तुम्हारे पास आता है तो बहू के पैसों पर क्यों नजर रखती हो। क्या चाहिए तुम्हे? चलो मैं ले कर चलता हूं जो चाहिए ले लो किसने मना किया है"। "आप समझते ही नहीं हो बस हर बात की मज़ाक में उड़ा देते हो। अरे इतनी इज्जत की हकदार तो हूं कि नहीं एक बार मेरे हाथ में रख देती तो मैं चूमकर उसे वापिस ही कर देती ना बड़ी हूं, सास हूं उसकी तो इतनी भी इज्जत नहीं दे सकती। कल मैंने कहा बेटा अब किचन में सुबह उठकर थोड़ा हाथ बटा दिया करो ब्रेकफास्ट तुम बना लिया करो मैं लंच की तैयारी कर लिया करूंगी पैरों में दर्द की वजह से ज्यादा देर तक नहीं खड़ी हो सकती तो पता है क्या जवाब आया मम्मी आप अपना ब्रेकफास्ट और लंच बना लिया करो मैं अपने और राहुल का मैनेज कर लूंगी। देखो तो अभी से मेरा तुम्हारा करने लगी"। अब मदन जी गंभीर हो गए। कप टेबिल पर रखते हुए बोले " तुम्हे ३५ साल पहले की याद नहीं आयी ये वही शब्द हैं जो तुमने शादी के बाद मुझे बोले थे।" क्या मतलब मैंने कब ऐसा कहा किसी को" शारदा जी ने एकदम उत्तर दिया। "तुम्हारी याददाश्त कम हो गई है मैं याद दिलाता हूं शादी के बाद जब तुमने ऑफिस ज्वॉइन किया था और तुम्हे पहली तनख्वाह मिली थी तो मैंने तुम्हे कहा था ना कि इसे बीजी के हाथ में दे दो उन्हें अच्छा लगेगा तो तुमने दो टूक उत्तर दिया था कि ये मेरी तनख्वाह है इस पर मेरा अधिकार है मैं किसी को नहीं दूंगी और मैंने तब तुम्हें ये भी कहा था कि बीजी नहीं रखेंगी लेकिन उन्हें अच्छा लगेगा कि बहू ने उनका मान रखा लेकिन तुम तो ट्स से मस ना हुई। और ये जो तुम काम की बात कर रही हो तो उसमे फर्क सिर्फ इतना है कि तुम अपना भी नहीं बनाती थी। चाय भी तुम्हे कमरे में मिलती थी और लंच भी तुम्हे पैक मिलता था। रात को भी तुम सिर्फ फुल्के डालती थी। किसी दिन अगर बीजी की तबीयत खराब ही जाती थी तो खाना बाहर से आता था क्योंकि तुम्हारी तबीयत तो पहले ही खराब हो जाती थी। ना ना मैं तुम्हे सुना नहीं रहा हूं सिर्फ आईना दिखा रहा हूं । आज ३५ साल के बाद सिर्फ कैरेक्टर बदले है कहानी वही है पहले बीजी और तुम थी और आज तुम और बहू हो।" कहते हुए मदन जी अंदर चले गए और शारदाजी मदन जी के दिखाए हुए आईने में अपना अक्स देखती रही।
शिप्पी नारंग (लघुकथा के परिंदे)

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