Tuesday, March 16, 2021

हंसते ज़ख़्म

 


गर्मी के मारे गला सूख रहा था इधर उधर नजर दौड़ाई तो एक रेस्टोरेंट नजर आया और मैं लपक कर घुसी और एक जगह खाली पाकर बैठ गई और फिर याद आया सुबह से कुछ खाया नहीं है तो एक नींबू पानी और सैंडविच का ऑर्डर देकर अपना मोबाइल चेक करने लगी तभी एक खुशबू का झोंका आया सामने नजर दौड़ाई तो देखा एक खूबसूरत सी 40- 45 वर्षीया महिला नजर अाई। आंखों पर धूप का चश्मा सफेद रंग का हाई नेक का कुर्ता और प्लाजो और चेहरे पर मास्क उसने इधर उधर देखा और फिर शालीनता से एक वेटर को बुलाया और धीरे से कुछ कहा वेटर 2 मिनट के बाद ही एक गिलास पानी ले आया महिला ने पानी पीने के लिए जैसे ही मास्क उतारा मेरे मुंह से निकला "आभा"महिला ने चौंक पर मेरी ओर देखा और आंखों में एक पहचान से उभरी और पानी का गिलास टेबल पर रख कर वह फौरन मेरे पास अाई और "संगीता" कहते हुए गले लग गई आवेग से दोनों का गला रूंध गया वह आभा थी मेरी प्रिय सखी हम तकरीबन 8-10 साल बाद मिल रहे थे मैं न्यूजीलैंड चली गई थी पतिदेव का प्रोजेक्ट था तो कंपनी ने उन्हें भेज दिया बच्चे दोनों सेटल हो गए थे अपनी दुनिया में मस्त हो गए तो मैं भी पतिदेव के साथ चली गई वहां से मैंने आभा को कई बार फोन लगाया पर उसने शायद अपना नंबर बदल लिया था या कुछ और वजह थी उससे बात ही नहीं हो पा रही थी बहुत खोजने पर मुझे  खबर मिली कि उसकी हालत बहुत खराब है वो डिप्रेशन में चली गई है और किसी से भी मिलती जुलती नहीं है अब डिप्रेशन में क्यों गई इसका उत्तर मुझे किसी से नहीं मिला और फिर एक बार जो पता चला उससे तो मैं भी पूरी तरह से हिल गई पर वह खबर कितनी सच थी कितनी झूठ वह पता नहीं चल पाया और फिर धीरे धीरे मैंने भी नई जगह नए देश में अपना एक सर्कल बना लिया और फिर इतने साल कैसे बीते पता ही नहीं चला। और आज अचानक आभा को इस रूप में देखकर मैं आश्चर्यचकित हो गई थी कि जो मैंने आभा के बारे में सुना था वह सही था या यह आभा जो मेरे सामने इतने आत्मविश्वास से बैठी हुई थी।  "कहां गायब थी मैंने तुम्हें कितना फोन लगाया, सब से पूछा पर कुछ भी ना पता चला सब ठीक था ना ? मैंने आभा से पूछा । "तुम्हें कैसी लग रही हूं ?" आभा ने हंसकर पूछा । "वही तो.. जो सुना था उससे तो एकदम उलट ही हो एक दम बिंदास वैसे ही स्मार्ट और कॉन्फिडेंट तो पहले से ज्यादा "  मैंने भी हंसकर कहा । "अच्छा क्या सुना था तुमने ?"  प्रश्न आया आभा की तरफ से "यही कि ....छोड़ और बता सब ठीक है" मैंने एकदम बात बदल दी । "नहीं बता ना क्या सुना आभा पीछे ही पड़ गई । "यही कि..." अभी इतना ही बोल पाई की आभा की  आवाज आई मुझे कोढ़ हो गया था,  मैंने सुसाइड करने की कोशिश की मैं डिप्रेशन में चली गई यही सुना था ना"  मैंने हां में सर हिला दिया और पूछा क्या यह सब सच था आभा का जवाब था सिर्फ एक बात सच थी कि मैं डिप्रेशन में चली गई थीयह सच है तो फिर यह बीमारी का नाम बीच में कैसे आया"  मुझे बीमारी का नाम लेने में भी बुरा लग रहा था और जिसने इस नाम को अपने से जुड़ा पाया होगा उसे कितना बुरा लगा होगा । "तुझे बताया किसने ... रुक मैं बताती हूं मेरी ननद ने... है ना?" मैंने हैरानी से देखा "हां" मेरा जवाब था । " सुन मैं बताती हूं ।  एक दिन मैं रवि के साथ लूडो खेल रही थी कि रवि अचानक बोल पड़ा "मम्मा ये क्या हुआ मैंने देखा मुझे मेरे पैर में एक छोटा सा दाग दिखाई दिया उस समय तो मैंने ध्यान नहीं दिया पर थोड़े समय के बाद देखा तो वह बढ़ गया और अब हाथों में भी दाग दिखने लगे तो डॉक्टर को दिखाया तो उसने कहा यह ल्यूकोडर्मा है,  सफेद दाग,  त्वचा रोग इसमें शरीर में सफेद सफेद धब्बे होने लगते हैं जो धीरे-धीरे बढ़ते जाते हैं अब मैंने इलाज शुरू किया पर कोई फर्क नहीं पड़ा उल्टा दाग बढ़ने शुरू हो गए मुझे चिंता होने लगी पर दुख तब ज्यादा होने लगा जब लोग कुरेद कुरेद कर पूछने लगे धूप में कैसे लगता है, खारिश होती है..? भई तुम स्विमिंग पूल में मत जाया करो, अपना खाना अलग रखा करो,  बच्चे को छुआ मत करो वगैरा-वगैरा जबकि डॉक्टर ने कहा भी था कि यह छूत की बीमारी नहीं है पर लोगों को कौन समझाए हद तो तब हो गई जब बड़ी ननद की लड़की की शादी में ननद ने सबके सामने कह दिया भई.. हमारे भाई की तो जिंदगी खराब हो गई उसकी बीवी को तो कोढ़ हो गया है, अभी मैं कुछ कहती कि पतिदेव एकदम गुस्से से बोले दीदी बेकार की बात मत करो ये सफेद दाग हैं अगर कुछ पता ना ही तो मत बोला करो।  बस उस दिन मेरा दिमाग ऐसा हिला कि मैंने अपने आप को घर में ही कैद कर लिया किसी से भी मिलना जुलना बंद कर दिया फोन पर भी किसी से बात नहीं करती बस अपने आप में ही घुलने लगी । रवि के पापा को हमेशा कहती मेरे साथ ही ऐसा क्यों ? यूनानी, आयुर्वेदिक, होम्योपैथिक , एलोपैथी ऐसा कोई भी  इलाज नहीं बचा जो मैंने छोड़ा हो । कोई कुछ भी बताता मैं फौरन करती दूध से बनी चीजों को छोड़ दो मैंने छोड़ दिया  हरसिंगार के पत्ते लिया करो मैंने लिए पर कुछ ना होना था ना हुआ।  बस रवि और उसके पापा थे जो मेरी हिम्मत बनाए रखते थे। एक दिन भाई के बहुत बुलाने  पर मैं उनके  घर चली गई । अभी अंदर घुसे ही थे  कि भाभी ने प्लास्टिक की कुर्सी दरवाजे के पास रख दी और बोली आभा यहीं  बैठ जाओ और अभी किसी की तरफ से कोई प्रतिक्रिया आती रवि और उसके पापा एकदम से उठे और मेरा हाथ पकड़ कर बाहर आ गए बस इसके बाद तो मैं डिप्रेशन में चली गई खाना खाती तो खाती चली जाती कभी कभी दो दो दिन तक कुछ ना खाती कई बार सोती तो उठती भी नहीं थी, बिन बात रोना  करना शुरू कर देती बस चाहती कि कोई मुझसे कुछ ना बोले बस मुझे सोने दे । जिंदगी बेकार सी लगने लगी थी तुम्हें पता है ना मुझे स्लीवलेस पहनने का कितना शौक था पर अपनी इस बीमारी की वजह से लोगों के टोकने की वजह से मैंने फुल स्लीव्स और हाई नेक के गले पहनना शुरू कर दिए , दागों को छुपाने के लिए हाथों में मेंहदी लगाने लगी  ऐसे ही  पांच-छह साल निकल गए और फिर एक दिन तुम्हें याद होगा हमारी एक सहेली थी एकता,  वही जिसने मनोविज्ञान में एम ए किया था वह मुझे मिली और मेरी हालत देखकर पहले तो उसे विश्वास ही नहीं हुआ और फिर धीरे-धीरे उसने मुझे समझाना शुरू किया मुझे बाहर ले जाने लगी कभी मंदिर ले जाती कभी पिकनिक का प्रोग्राम बना लेती कभी मॉल ले जाती कभी डांट के, कभी प्यार से हर तरह से उसने मुझे समझाना शुरू किया । अपने घर भी ले गई उसकी दो बच्चियां थी जो रवि की ही हमउम्र थी 2- 4 साल का अंतर होगा उन्हें लेकर हमारे घर आ जाती घर में रौनक सी रहने लगी वह मुझे बहुत समझाती कि ऐसी बीमारी नहीं है कि तुम जिंदगी जीना ही छोड़ दो, स्थिति को स्वीकार करो, लोगों की बातों में ध्यान लगाना छोड़ दो । तुम्हें पता है तुम्हारा पति और रवि कितना ख्याल रखते हैं जिंदगी को जियो देखो दुनिया तुम्हें कभी खुश देख नहीं सकती आज यह बात तो कल कोई और बात।  रही बात इस समाज की तो समाज किसी को दुखी देखकर ही खुश होता हैं तुम उन लोगों के लिए अपनी जिंदगी क्यों खराब कर रही हो । जो पहनना है पहनो , जहां जाना है जाओ जब नाचने का मन करे तो नाचो पति और बेटे को अपनी वजह से दुखी मत करो तुम उनकी जिंदगी हो तुम्हारे बिना उनकी ज़िंदगी कैसी होगी तुमने कभी ये सोचा है।"  और मैंने एक बार कहीं पढ़ा था कि  'वक़्त के साथ हर ज़ख़्म भर जाता है हकीकत ये है कि ज़ख़्म वही रहता है पर उसे सहने की आदत हो जाती है' और फिर सच में मैंने अपने आप को बदलना शुरू किया। एकता मुझे 1-2 NGO में ले के गई और फिर मुझे लगा कि दुनिया में तो मेरे से भी ज्यादा दुखी लोग हैं बस मैंने फिर जीना शुरु किया मुझे जो मेरा दिल करता है करती हूं घर में भी खुश रहती हूं बाहर भी खुश रहती हूं । हफ्ते में दो बार NGO भी जाती हूं । भगवान ने एक काम तो बहुत अच्छा किया कि मुझे पति बहुत प्यारा दिया बेटा बहुत केयरिंग है वरना घर में ही अगर मेरी ननद और भाभी जैसे लोग  हों  तो बाहर व किसी दुश्मन  की तो जरूरत ही नहीं है । अब मैं सब को समझाती हूं जिंदगी को जिंदादिली से जियो बस सोचो तुम ही तुम हो और खुश रहो और आभा की आंखों की चमक  उसकी खुशी को बयां कर रही थी । 

शिप्पी नारंग (हिंदी प्रतिलिपि)
नई दिल्ली

एहसास

 

डॉक्टर के क्लिनिक से निकल कर मैं आगे बढ़ा। मेरे 88 वर्षीय पिताजी अपनी छड़ी टेकते हुए धीरे धीरे आगे जा रहे थे। मेरे हाथ में पिताजी की स्वास्थ्य संबंधी फाइल थी। अचानक एक 8-10 वर्षीय बालक दौड़ता हुए पिताजी के पास से निकला। कुछ कदम आगे दौड़ा फिर पिताजी के पास आकर बोला " दादू, मैं आपको बाहर तक छोड़ आऊं।" मैंने सुनी पिताजी की गर्व मिश्रित आवाज़ " नहीं, मेरा बेटा पीछे आ रहा है।" बच्चे ने मुड़कर मुझे देखा, मुस्कराया और फिर आगे दौड़ गया। मेरे अंदर से छनाक की आवाज़ आई आंखो में आंसू आ गए। मैंने पिताजी की फाइल खोली, एक पेपर निकाला और चिंदी चिंदी करके हवा में उछाल दिया । यह मैं क्या कर रहा हूं पिताजी के विश्वास को तोड़ रहा हूं इन चार शब्दों में ही उन्होंने पुत्र के प्रति अपने विश्वास को जता दिया और में उनके इसी विश्वास को तोड़ने जा रहा हूं। कदम तेजी से बढ़ाता हुए पिताजी के पास जाकर उन्हें छुआ। पिताजी ने देखा और अपना दूसरा हाथ मेरे कंधे पर रख दिया और हम दोनों आगे बढ़ गए।
      ओह हो .. मैं बताना भूल गया कि जो पेपर मैंने फाड़कर हवा में उछाल दिया था वो एक वृद्धाश्रम का फॉर्म था जहां मैं दो दिनों के बाद उन्हें छोड़ने जा रहा था

शिप्पी नारंग (लघुकथा के परिंदे)
नई दिल्ली
25/2/2021

आईना


‌मदन जी सुबह सुबह बालकनी में बैठकर अख़बार पढ़ते हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे कि तभी पत्नी, शारदा जी हाथ में अपना चाय का कप लेकर आईं और बैठ गईं। मदन जी ने अख़बार सामने से हटाया और पत्नी के चेहरे को देखते ही समझ गए फिर कुछ कहने का माहौल बनाया जा रहा है। पूछ ही लिया " क्या हुआ मुंह क्यों उतरा हुआ है?" शारदा जी इसी क्षण की प्रतीक्षा कर रही थी कि पतिदेव कुछ पूछें तो वो शुरू हो जाएं। "अरे देखो ना आजकल की बहुओं को संस्कार तो सीख कर ही नहीं आती हैं । चार  महीने हो गए बहू को ऑफिस ज्वॉइन किए हुए। रोज़ ऑफिस जाती है, सैलेरी भी लाती होगी पर मजाल है कि एक बार भी सैलेरी मेरे हाथ में रखी हो या बोला हो कि मम्मी ये मेरी तनख्वाह है आप रख लीजिए। मैं कौन सा रख लेती पर ऐसा कह देती तो छोटी तो ना हो जाती और मेरा सम्मान भी रख लेती।" "तो तुम्हे क्या पैसे की कमी है अच्छी भली तुम्हारी पेंशन आती है मेरी पेंशन पर भी तुम्हारा पूरा हक है मकान के ऊपरी हिस्से का किराया भी तुम्हारे पास आता है तो बहू के पैसों पर क्यों नजर रखती हो। क्या चाहिए तुम्हे? चलो मैं ले कर चलता हूं जो चाहिए ले लो किसने मना किया है"। "आप समझते ही नहीं हो बस हर बात की मज़ाक में उड़ा देते हो। अरे इतनी इज्जत की हकदार तो हूं कि नहीं एक बार मेरे हाथ में रख देती तो मैं चूमकर उसे वापिस ही कर देती ना बड़ी हूं, सास हूं उसकी तो इतनी भी इज्जत नहीं दे सकती। कल मैंने कहा बेटा अब किचन में सुबह उठकर थोड़ा हाथ बटा दिया करो ब्रेकफास्ट तुम बना लिया करो मैं लंच की तैयारी  कर लिया करूंगी पैरों में दर्द की वजह से ज्यादा देर तक नहीं खड़ी हो सकती तो पता है  क्या जवाब आया मम्मी आप अपना ब्रेकफास्ट और लंच बना लिया करो मैं अपने और राहुल का मैनेज कर लूंगी। देखो तो अभी से मेरा तुम्हारा करने लगी"। अब मदन जी गंभीर हो गए। कप टेबिल पर रखते हुए बोले " तुम्हे ३५ साल पहले की याद नहीं आयी ये वही शब्द हैं जो तुमने शादी के बाद मुझे बोले थे।" क्या मतलब मैंने कब ऐसा कहा किसी को" शारदा जी ने एकदम उत्तर दिया। "तुम्हारी याददाश्त कम हो गई है मैं याद दिलाता हूं शादी के बाद जब तुमने ऑफिस ज्वॉइन किया था और तुम्हे पहली तनख्वाह मिली थी तो मैंने तुम्हे कहा था ना कि इसे बीजी के हाथ में दे दो उन्हें अच्छा लगेगा तो तुमने दो टूक उत्तर दिया था कि ये मेरी तनख्वाह है इस पर मेरा अधिकार है  मैं किसी को नहीं दूंगी और मैंने तब तुम्हें ये भी कहा था कि बीजी नहीं रखेंगी लेकिन उन्हें अच्छा लगेगा कि बहू ने उनका मान रखा लेकिन तुम तो ट्स से मस ना हुई। और ये जो तुम काम की बात कर रही हो तो उसमे फर्क सिर्फ इतना है कि तुम अपना भी नहीं बनाती थी। चाय भी तुम्हे कमरे में मिलती थी और लंच  भी तुम्हे पैक मिलता था। रात को भी तुम सिर्फ फुल्के डालती थी। किसी दिन अगर बीजी की तबीयत खराब ही जाती थी तो खाना बाहर से आता था क्योंकि तुम्हारी तबीयत तो पहले ही खराब हो जाती थी। ना ना मैं तुम्हे सुना नहीं रहा हूं सिर्फ आईना दिखा रहा हूं । आज ३५ साल के बाद सिर्फ कैरेक्टर बदले है कहानी वही है पहले बीजी और तुम थी और आज तुम और बहू हो।" कहते हुए मदन जी अंदर चले गए और शारदाजी मदन जी के दिखाए हुए आईने में अपना अक्स देखती रही।

      शिप्पी नारंग (लघुकथा के परिंदे)

सवाल

 

"अरे ये क्या है, बहुत सुंदर रंग है।" मधु ने अपनी छोटी बहन, नीलम से पूछा जो अपनी अलमारी ठीक कर रही थी। "ये" कहते हुए नीलम ने पूछा और एक लाल रंग का सुंदर सा दुपट्टा निकाला। " हां ये, बहुत सुंदर है किसका है। " मेरा है" नीलम ने कहा तो मधु ने भौंहों को चढ़ाकर पूछा " तेरा..?" "हां, क्यों"? "तूने लिया है ये रंग..?" दोबारा एक प्रश्न उछला मधु की तरफ से। " नहीं, वो मोना भाभी हैं ना जिनके यहां में काम करती हूं ना उन्होंने पिछले महीने मुझे दिया था मेरे जन्मदिन पर"। "और तूने ले लिया" मधु ने थोड़ी तेज आवाज़ में पूछा "तू पहनेगी ये रंग...?" "क्यों, क्यों नहीं पहनूंगी मैं ये रंग..?" " नहीं एकदम चटख लाल रंग है ना इसीलिए पूछा" मधु ने कहा " तो"  प्रत्युत्तर में पूछा गया । " नहीं वैसे ही पूछा" जवाब आया। "सब समझती हूं दीदी आप क्यों पूछ रही हैं । अब अगर मेरा आदमी मुझे छोटी उम्र में ही छोड़कर भगवान के पास चला गया तो क्या अब मुझे खुश रहने का , मनपसंद ओढ़ने का भी हक नहीं रहा क्या..? १६ साल की उम्र में आप लोगों ने मेरी शादी करवा दी १९ की उम्र तक मैं दो लड़कियों की मां भी बन गई। २५ की उम्र में पतिदेव भगवान के पास चले गए तो क्या मैं भी जीना छोड़ दूं ? क्या मुझे अब भी खुश रहने का  मनपसंद पहनने का हक भी नहीं रहा..?" " पर लोग तो बातें बनाते हैं ना" मधु ने कहा। " कौन से लोग, आप जैसे लोग, जो मुझे मुसीबत में अकेला छोड़कर चले गए थे, किसी ने भी सोचा था कि मैं दो लड़कियों के साथ कैसे ज़िन्दगी बिताऊंगी, तब तो सब को लग रहा था कि कहीं हमारे पल्ले ही  ना पड़ जाए। और तब की तो बात छोड़ो अब भी कौन मेरे साथ खड़ा है। कोई सोचता भी है कि मैंने दो दो लड़कियों की भी शादी करनी है। वो तो बच्चियां पढ़ाई में अच्छी है तो थोड़ी चिंता कम हो गई। " पर समाज..." मधु ने अभी इतना ही कहा कि नीलम एकदम तड़प कर बोली  " कौनसा समाज  दीदी कैसा समाज। समाज ने मुझे क्या दिया जो मैं समाज से डरूं। वो तो भला हो मोना भाभी का जिन्होंने मुझमें इतनी हिम्मत पैदा की। और एक बात बताओ दीदी ये रंग कब से खुशी और गमी का प्रतीक बन गए हैं। अगर ऐसा है तो तुमने ये सफेद रंग का सूट क्यों पहन रखा है जीजाजी तो अभी....कहते हुए नीलम ने बात को अधूरा छोड़ा और फिर कहा " आप जैसे लोग सफेद रंग पहने तो फैशन और हम जैसे लोग लाल रंग पहने तो ... हम पर सवालिया निगाहें क्यों...? और ये कहते हुए नीलम ने वो लाल दुपट्टा अपने कंधे पर डाल दिया।

शिप्पी नारंग
नई दिल्ली

ठाकुर जी का भोग

 


बेटी नेहा के घर के घुसते ही निशा जी, नेहा की मम्मी ने नेहा की सासू मां सुषमाजी के पास जाकर उनका हाथ अपने दोनो हाथों में लिया और बोलने लगी "मैं नेहा की तरफ से माफी मांगती हूं। अक्ल नहीं है इसीलिए ऐसा काम कर दिया । मैंने बहुत डांटा उसे और समझा भी दिया है आगे से ऐसा नहीं करेगी आप मेरा विश्वास करें ।" "पर उसने किया क्या है..?" प्रश्न आया । "आपको नहीं पता..?" हैरानी भरा स्वर उभरा। "अरे ठाकुर जी के भोग वाली बात न.. पता है" सुषमाजी की आवाज़ आई । " आपको कुछ गलत नहीं लगा" अब स्वर में बैचैनी थी। " नहीं तो गलत क्या था इसमें । नेहा ने ठाकुर जी को भोग लगा दिया मैगी का  सही तो क्या हुआ, भोग लगाया तो" और फिर  आगे कहने लगी " देखिए आप को तो पता है में हर महीने दो तीन दिन के लिए वृन्दावन जाती हूं इस बार  तीन चार महीने से शादी में बिजी होने की वजह से नहीं गई तो सोचा कि चलो सब अच्छे से निपट गया तो वृन्दावन चली जाती हूं । पहले जब जाती थी तो आकाश की ताई जी ठाकुर जी को भोग लगा दिया करती थी पर इस बार वो भी साथ जा रहीं थी तो मैं सोच रही थी कि क्या करूं तो नेहा ही बोली कि मम्मा आप जाओ मैं लगा दूंगी भोग तो मैं निश्चिन्त हो गई और चली गई । आकाश हंस भी रहा था कि कुछ पता भी है पर नेहा ने कहा हां में देख लूंगी जो हम खाएंगे वो ठाकुर जी को भी खिला दूंगी। अब उसने मैगी बनाई और ठाकुर जी को भी खिला दी तो क्या हुआ।" "पर"....निशाजी कुछ कहती उससे पहले सुषमा जी अब कुछ गंभीर स्वर में बोल उठीं " देखिए हमारे कुछ संस्कार होते हैं जिनसे हम बंधे हुए होते हैं और चाहते हैं कि हमारे बच्चे भी उन्हें अपनाएं और वो जब अपनाते  हैं तो हमें अच्छा लगता है पर हम वही नियम या संस्कार उन पर थोपें तो ये गलत है। आज का माहौल आप देख रही हैं ज़िन्दगी कितनी तनाव भरी है। बच्चों को सुबह सुबह ७-७.३० बजे तक निकालना होता है आते आते ८-९ बजना मामूली बात है। अब उस पर हम अपने नियमों से उन्हें बांध दे तो गलत है ना और फिर एक बात और मैंने नोट की है कि हम आज की पीढ़ी को खासकर लड़कियों को गैर जिम्मेदार मानते हैं कि बस ये तो काम करना ही नहीं चाहती अपने से ही मतलब रखती हैं पर ऐसा है नहीं। समय आने पर सब अच्छे से संभाल लेती हैं हां तरीका जरूर अलग होता है। अब नेहा ने समय की कमी होते हुए भी दिल से भोग  लगाया चाहे मैगी का ही सही लगाया तो ... तो क्या यह बड़ी बात नहीं है । मुझे तो बड़ी खुशी हो रही है कि उसने मेरी बात का मान रखा, नियम को तोड़ा नहीं और ठाकुर जी को भी भूखा नहीं रखा और फिर मेरा यह भी मानना है कि ठाकुर जी भावना के भूखे होते हैं पकवानों के नहीं...क्यों नेहा।" नेहा खिलखिलाकर हंस पड़ी और इतने में नेहा के ससुर जी बोल पड़े मैं तो कह रहा था कि इस बार ठाकुर जी बहुत खुश होंगे रोज़ दूध, माखन मिश्री खाकर बोर हो गए होंगे चलो नई बहू के राज में कुछ नया खाने को तो मिला" और कमरा ठहाकों से गूंज उठा।

शिप्पी नारंग (laghukatha ke parinde)
नई दिल्ली
10/3/2021