"अरे मम्मी कहां रह गई, जल्दी आओ भूख लगी है", पंकज ने आवाज़ लगाई। "आ रही हूं" मम्मीजी की आवाज़ आयी। "वो किचन साफ कर रही थी" मम्मीजी ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा। "क्यों तुम किचन साफ कर के नहीं आती" पंकज ने थोड़ा गुस्से से मुझसे पूछा।अभी मैं कुछ कहती कि गौरव, मेरे देवर, ने कहा" अरे भाई मॉम को काम करने की आदत है, काम नहीं भी होगा तो वो ढूंढ़ लेंगी तुम खाना खाओ"। मामला वहीं रफ़ा दफा हो गया। पर अब लग गया कि रात को फिर से लेक्चर शुरू हो जाएगा। "तुम करती क्या हो सारा दिन? जब देखो मम्मा ही लगी रहती हैं। थोड़ी हेल्प करा दिया करो। उनकी भी उम्र ही गई है। नहीं आता तो पूछ लिया करो पूछने से तुम छोटी तो नहीं हो जाओगी"। वगैरा वगैरा।
मेरी और पंकज की शादी को सात महीने हुए थे। एक दो महीने तो यूंही गुजर गए पता ही नहीं चला। पर फिर घर की जिम्मेदारी उठाने लगी तो पता चलने लग गया कि लोगों के सामने तो मैं बेटी हूं पर मुझे तो अभी बहू का दर्जा भी नहीं मिला। घर में मुझे और पंकज को मिलाकर छह लोग थे - सास ससुर, देवर गौरव और ननद सौम्या। सब काम के लिए कामवाली लगी हुई थी जो बर्तन, सफाई कर जाती थी। कपड़े मशीन में धुलते थे और डस्टिंग खुद करते थे। सुनने में लग रहा है ना कि फिर दिक्कत क्या है? पर दिक्कत थी और सबसे बड़ी दिक्कत थी मम्मीजी का दिखावा। मैंने नोट किया कि जब भी पंकज घर पर होते तो मम्मीजी एक मिनट के लिए भी नहीं बैठती थी। कभी किचन में लगे हुए बर्तनों को ही इधर उधर करने लग जाती, कभी कपड़ा ले कर डस्टिंग करने लग जाती और कभी कुछ नहीं समझ आया तो मलाई से घी निकालने का काम शुरू हो जाता। जैसे ही पंकज अपने कमरे में जाते सब कुछ वहीं रखकर अपने कमरे में चली जाती और समेटना मुझे पड़ता।
घर में कोई मेहमान आने पर मैं नमस्ते करके हाल चाल पूछकर चाय पानी के लिए किचन में घुसती तो मम्मीजी पीछे पीछे आ जाती। स्नैक्स वगैरा निकालने लग जाती मैं कहती कि मम्मीजी आप बैठिए वहां मैं ले आऊंगी तो जवाब आता पापा और पंकज बैठें हैं वहां पर। मुझे अजीब लगता कि अब दोनों का क्या काम क्या मैं चाय भी नहीं बना सकती पर जैसे ही मैं ट्रे उठाने लगती मम्मीजी मेरे हाथ से ट्रे ले लेती और कहती तुम किचन समेट लो और जल्दी से आ जाओ। अब अंदर जाकर डायलॉग मारा जाता कि थोड़ी ढीली है काम में इसीलिए मुझे देखना ही पड़ता है और बाद मम्मीजी की वाहवाही शुरू हो जाती जिसकी शुरुआत हमेशा पंकज करते। मुझे लगता किया तो मैंने सब और शाबाशी इन्हें मिल रही है पर तब ये नाटक समझ में नहीं आते थे।
पंकज के ऑफिस जाने से पहले मैं सुबह ५.३० बजे उठकर किचन में आकर सब्जी दाल दोनों बनाती थी और नाश्ते की तैयारी भी कर लेती थी । गौरव और सौम्या भी लंच लेकर जाते थे तो उनका भी लंच तैयार रहता था। सात बजे तक मेरा काम खतम हो जाता था सिर्फ चपाती बनानी रह जाती थी । फिर मैं चाय बनाकर मम्मी पापा को देकर अपनी और पंकज की चाय कमरे में ले जाती। वहीं चाय पीते पीते मैं कमरा समेटती जाती और पंकज तैयार होते रहते लेकिन जब तक मैं किचन में जाती मम्मीजी किचन में घुस जाती और सबको आवाज़ें लगाना शुरू कर देती आ जाओ मैंने लंच पैक कर दिया है। गौरव और सौम्या तो कुछ ना कहते पर पंकज शुरू हो जाते "अरे मम्मा आप सुबह सुबह क्यों लग जाते हो नेहा को करने दिया करो आप आराम से उठा करो"। और मम्मीजी का जवाब आता " कोई बात नहीं बेटा कितना टाइम लगता है ये सब करने में अब तो आदत हो गई है काम करने की, आराम तो मरने के बाद ही होगा" और पंकज का घूरना और मेरा सुलग जाना एक साथ होता था।
पर धीरे धीरे सब समझ में आने लगा कि ये सब पंकज को दिखाने के लिए किया जाता है यानी पंकज घर पर है तो एक मिनट भी नहीं बैठना और पंकज घर पर नहीं है तो पानी का ग्लास भी नहीं उठाना। और पंकज इतने मात्रभक्त कि में कुछ बोलती तो विश्वास ही नहीं करना ऊपर से सुनने को मिलता मम्मी से सीखो घर चलाना। अब कितना बोलती और क्या बोलती क्योंकि पंकज वहीं बोलते थे जो देखते थे। गौरव मुझे कितना बार बोलता " भाभी बोलना सीखो सब काम करती हो तो बताया भी करो भाई को" और मेरा कहना था कि काम कोई दिखावे के लिए किया जाता है क्या? घर का ही तो काम कर रहे हैं और घरवालों के ही आगे ढोल बजाएं। पर अब शायद मैं ही गलत थी क्योंकि पंकज को सिर्फ मम्मीजी काम करते हुए दिखती थी और मैं आराम करते हुए। लेकिन अब मुझे कोफ्त होने लगी थी इस दिखावे से। हम पति पत्नी के बीच और कोई प्रॉब्लम नहीं थी, पंकज बहुत ही केयरिंग थे पर मां को लेकर उतने ही पोजेसिव और मम्मीजी इस बात का पूरा फायदा उठाती थी। पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा था रोज़ की वहीं मेरी और पंकज की किचकिच। मुझे लगने लगा था या तो मैं भी दिखाकर काम करना शुरू कर दूं या फिर पंकज को वास्तविकता से अवगत कराऊं।
अगले दिन डिनर शुरू होने से पहले मैंने पंकज को बुलाया और कहा देख लो कुछ बाकी है करने को सब कुछ साफ़ सुथरा और जगह पर है ना..? पंकज ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा और कुछ पूछने से पहले मैंने कहा " अभी २-३ दिन बाद इसका जवाब आपको खुद मिल जाएगा बस कुछ बोलो मत"। चार दिन तक मैं रोज़ पंकज को बुलाकर किचन दिखा देती। पंकज को अब कुछ कुछ समझ में आने लग गया था क्योंकि मम्मीजी का रोज़ का वहीं डायलॉग होता था "किचन समेट रही हूं" । एक दिन सभी डाइनिंग टेबल पर आ गए पंकज ने आवाज़ लगाई और मम्मीजी का जवाब आया " आ रही हूं किचन थोड़ी समेटनी रह गई है" मेरी और पंकज की नजर मिली पंकज गुस्से से उठे किचन में जाकर पूछा क्या समेट रही हो। बस खाना बनाना ही थोड़ा ना काम होता है समेटना भी पड़ता है.. मम्मीजी का जवाब आया। "तो समेटने के लिए आपको क्या मिला, में अभी देखकर गया हूं और पिछले चार दिनों से देख रहा हूं एक चम्मच भी नहीं पड़ा रहता" । मम्मीजी एकदम सकपका गई क्योंकि उन्हें विश्वास ही नहीं रहा था कि पंकज ऐसा भी बोल देगा। पीछे मैं खड़ी थी मम्मीजी की नजरें मुझसे मिली और वो चुपचाप टेबल की तरफ चल दी। मैंने पापाजी की तरफ देखा और आंखों ही आंखों में धन्यवाद् दिया....,क्योंकि ये आइडिया उन्हींका ही था।
