Tuesday, December 29, 2020

एहसास (बेटी को)

 


सुबह के दस बजे थे कि दरवाज़े की घंटी बजी। प्रमिला जी ने  चाय का कप रखा और दरवाज़े की तरफ बड़ी। रमेशजी भी तब तक अख़बार हाथ में लिए उठ खड़े हुए। प्रमिला जी ने हाथ से इशारा कर दिया कि "मैं जा रही हूं" दरवाज़े की तरफ चल दी। दरवाज़ा खोलते ही जो चेहरे उनके सामने आए उन्हें देखते ही मैं एक अनहोनी आशंका से भर उठा पर सब के चेहरे पर मुस्कान देखते ही मन को  थोड़ा सकून मिला पर थोड़ी चिंता तो अभी भी थी। कुछ कहती उससे पहले ही रमेश जी आगे बढ़े और दरवाज़े पर खड़े अपने समधी, अविनाश जी को गले से लगा लिया और कहा - "वाह क्या सरप्राइज दिया है"। अविनाश जी ने अपने चिरपरिचित अंदाज में ठहाका लगाया और कहा "इसी में तो मज़ा आता है देखिए भाभीजी हैरानी में खड़ी हैं भई ६ घंटे का सफर तय करके आएं हैं।" प्रमिला जी जैसे नींद से जागी और मुस्कराते हुए नमस्ते की और आगे बढ़कर अपनी समधन आशा जी के गले लग गई। पीछे बेटी रिचा और दामाद अमित खड़े थे ।अमित ने आगे बढ़ कर पावं छू लिए और रिचा मां के गले लग गई दोनों मां - बेटी की आंखें भर आईं। तब तक रमेशजी आगे बढ़े और बेटी पापा के सीने से लग कर फफक़ पड़ी। रमेशजी की भी आंखें गीली हो गईं पर अपने को सम्हाला और फिर दामाद को भी अपनी बाहों में भर लिया। सब मुस्कराते हुए देख रहे थे। अंदर आकर सब ड्राइंग रूम में बैठ गए और प्रमिला जी किचेन की तरफ बढ़ी ही थी कि अविनाश जी  की आवाज़ आई "भाभी जी चाय मिलेगी अदरक इलायची वाली" और ठहाका लगा प्रमिला जी मुस्कराते हुए बोली वही बनाने जा रही हूं भाई साहेब और किचेन में चली गईं। चाय लेकर जब ड्राइंग रूम में आयीं तो माहौल काफी खुशनुमा हो चुका था। अविनाश जी अपने चिर परिचित अंदाज में बैठे हुए बातों में मशगूल थे। दोनों समधी एकदम एक दूसरे के विपरीत थे जहां रमेश जी धीर गंभीर स्वभाव के थे वहीं अविनाश जी जहां भी बैठते माहौल एकदम मस्ती से भर जाता था पर दोनों समधियों में पटती भी बहुत थी और एक दूसरे की दिल से इज्जत करते थे। चाय पीते हुए यहां वहां के हाल पूछे और अभी प्रमिला जी नाश्ते के लिए उठती कि रिचा की सासू मां ने कहा " भाभी जी नाश्ता हमने रास्ते से पैक करवा लिया था कि मिलकर खाएंगे और फिर दोपहर तक अमित की बुआजी के घर पहुंचना है तो लंच वहीं करेंगे"। "अरे ये क्या बात हुई, अब आएं हैं तो एक -दो  दिन रुकते अभी तो बैठे भी नहीं" प्रमिला जी ने कहा। " हां जी हमारा भी दिल था कि हम आप के पास रुकते थोड़ी खातिरदारी करवाते पर क्या करें थोड़ी मज़बूरी है" अविनाश जी ने अपनी परिचित शैली में कहा। "असल में दीदी की बेटी की बात पक्की हो गई है दो महीने बाद शादी है तो सोचा कि बधाई भी दे आएंगे और काम भी पूछ आएंगे" आशा जी ने कहा "रहने के लिए फिर आएंगे"। प्रमिला जी ने बेटी की ओर देखा दिल कुछ उदास हो गया कि बेटी इतनी जल्दी चली जाएगी अभी  तो उसका हाल चाल भी नही पूछा की अविनाश जी की आवाज़ आयी" अरे दुखी क्यों हो रही है भाभी जी, रिचा अभी आपके पास पंद्रह दिन रहेगी अपने पापा से उसे ऐसी डोज मिली है कि बेचारी  तीन महीने से हंसना ही भूल गई है तो हमने सोचा की थोड़ा टॉनिक पिला कर आते हैं"। रमेश जी ने चौंक कर समधी जी की तरफ देखा और फिर बेटी की तरफ देख कर मुस्करा दिए। "अमित आएगा दो तीन हफ्ते के बाद रिचा को के जाएगा "। "नहीं नहीं, रिचा को हम छोड़ने आएंगे" रमेश जी ने तुरंत कहा "तो ठीक है फिर वायदा रहा कि आप कुछ दिन हमारे साथ रहेंगे" अविनाश जी ने कहा और रमेश जी ने थोड़ी हिचक के साथ हां कर दी।

     दो बजे तक वो सब चले गए। प्रमिला जी किचेन समेट कर कमरे में आई तो दोनों बाप बेटी किसी बात पर हंस रहे थे। रिचा मां को देखते ही बैठ गई और बोली "मम्मा थक गई आप बैठो मैं आप दोनों के लिए चाय बना कर लाती हूं बढ़िया सी। खाना तो खाना नहीं है पेट एकदम भरा हुआ है, क्यों पापा ?" रमेश जी ने सहमति में सिर हिला दिया और पत्नी को बैठने का इशारा किया और रिचा कमरे से बाहर चली गई। प्रमिला जी थक गईं थीं तो थोड़ी देर लेट गईं।
"क्या सोच रही हो" रमेश जी ने पत्नी से पूछा। " कुछ नहीं बस यही दिमाग में चल रहा है कि ज़िन्दगी में औलाद की बेहतरी के लिए कितने कड़वे घूंट पीने पड़ते हैं ।" "सही कहा तुमने, अब बच्चों की गलतियों को हम नहीं  बताएंगे तो कौन बताएगा। उस समय हम रिचा को गलत बात पर थोड़ी सी भी शह देते तो उसकी तो आदत हो जाती जिम्मेदारी से भागने की।

और प्रमिला जी छह महीने पीछे चली गईं। अभी रिचा की शादी को दो महीने ही हुए थे कि आशा जी वॉशरूम में फिसल गईं और पांव में फ्रैक्चर हो गया। डॉक्टर ने डेढ़ महीने का प्लास्टर लगा दिया और आराम के लिए बोल दिया।अब घर का काम रिचा के कंधे पर आ गया। हालांकि कामवाली लगी हुई थी पर किचेन  का काम रिचा को करना पड़ता था जाहिर है काम थोड़ा बढ़ गया था समय समय पर चाय, दूध, जूस वगैरा आशा जी को देना, आने जाने वालों की आवभगत और फिर तीनों समय का खाना। अभी अमित और अविनाश जी काफी सहायता कर देते थे पर रिचा अब बिना बात के चिड़चिड़ाने लगी थी। ऐसा नहीं था कि उसे काम नहीं आता था मां ने उसे काफी अच्छी ट्रेनिंग दी थी पर शादी के एकदम बाद ऐसी जिम्मेदारी से वो घबरा गई और वहां से भागने के लिए छटपटाने लगी और बात बेबात में रोना धोना मचा देती। अमित के साथ अक्सर बहस हो जाती थी और आवाज़ें बाहर तक आ जाती थी। अविनाश जी अनुभवी व्यक्ति थे  और सब समझते थे इसीलिए हालात बिगड़ने की कगार पर पहुंचते इससे पहले ही उन्होंने अमित को रिचा को उसके मायके ले जाने का आदेश दे दिया। अमित इसके लिए बिल्कुल तैयार ना था पर मम्मी पापा के कहने से रिचा को छोड़ने के लिए तैयार हो गया पर मन में काफी गुस्सा था उसे रिचा से ऐसे व्यवहार की बिल्कुल भी उम्मीद ना थी। रिचा की खुशी का कोई पारावार ना था। चंडीगढ़ से दिल्ली का सफर पांच घंटे का था अतः अमित ने सुबह चार बजे निकालने का प्रोग्राम बनाया। उसने प्लान बना लिया था कि सुबह 9-10 बजे तक दिल्ली पहुंच जाएंगे और दोपहर को 2-3   बजे तक निकल लेगा तो रात तक घर वापिस पहुंच जाएगा।
‌सुबह 9.30 बजे दोनो घर पहुंच गए । घंटी बजाई रमेश जी ने दरवाज़ा खोला और बेटी दामाद को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। तब तक प्रमिला जी भी दरवाज़े पर पहुंच गईं और उनकी प्रतिक्रिया भी पति जैसे ही गई। वो दोनो जानते थे आशा जी के हालात अतः ऐसे समय बेटी दामाद को देख कर भौचक्का हो जाना स्वाभाविक था। दोनों के मुंह से एकदम निकला "क्या हुआ सब खैरियत से है" अमित कुछ कहते उससे पहले ही रिचा ने खुशी से चहकते हुए कहा "सब मज़े में है पापा बस आपकी याद आ रही थी तो हम लोग आ गए आपसे मिलने।" "और वहां मम्मी के पास कौन है वो तो अभी बिस्तर से भी नहीं उठ सकती" प्रमिला जी ने हैरानी से पूछा। "वो मैड को कह दिया है एक हफ्ते तक वो रूक जाएगी"अमित की तरफ से जवाब आया। "अच्छा अच्छा अंदर तो आओ" रमेश जी ने कहा। सब अंदर आ गए । प्रमिला जी चाय बनाने  किचेन में चली गई। जहां रिचा चहक रही थी वहीं अमित चुपचाप बैठा हुआ था और रमेश जी के चेहरे पर चिंता के भाव आ जा रहे थे। तभी प्रमिला जी चाय और स्नैक्स लेकर अाई और चाय का कप अमित को दिया। कप लेते हुए अमित ने कहा " मम्मी जी मैं थोड़ी देर लेटता हूं फिर दोपहर को 3 बजे तक निकल जाऊंगा तो रात को टाइम से पहुंच जाऊंगा रिचा जब कहेगी मैं लेने आ जाऊंगा "।  प्रमिला जी ने सिर हिला दिया कुछ कहा नहीं बस इतना पूछा कि घर पर फोन कर के बता दिया कि तुम लोग ठीक ठाक पहुंच गए हो।" " जी "अमित की तरफ से जवाब आया। "ठीक है आप आराम करो "। और प्रमिला जी ने अभी कदम बढ़ाए ही थे कि रमेश जी की आवाज़ अाई " ऐसा करो बेटा कल सुबह चले जाना एक ही दिन में इतनी ड्राइविंग करने से परेशानी हो सकती है, भाईसाहब से मैं बात कर लेता हूं" । "ठीक है पापा आप जैसे उचित समझें" और अमित कमरे की तरफ चल दिया। रिचा पहले ही कमरे में चली गई थी।  रमेशजी ने अविनाश जी से फोन पर बात की और पूछ लिया कि अमित रात को अगर रूक जाए तो अविनाश जी ने तुरंत हां कर दी। अब दोनों पति पत्नी विचार विमर्श करने लगे। उन्हें रिचा पर बहुत गुस्सा आ रहा था पर परिस्थिति को संभालना भी बहुत जरूरी हो गया था।

रात को डिनर के समय कहा "बेटा सुबह सुबह निकल लेंगे रिचा तुम्हारे साथ ही वापिस जाएगी और हम भी तुम्हारे साथ चलेंगे" अमित एकदम अचकचा गया शायद समझने और सम्हलने में समय लगा और फिर एकदम  बोल उठा " नहीं नहीं पापा आप क्यों तकलीफ़ करेंगे आप कुछ दिन रिचा को रहने दीजिए मैं आकर ले जाऊंगा। आप टेंशन मत लीजिए।" "मैं अभी नहीं जाऊंगी थक गई हूं काम करके" रिचा ने तुनक कर कहा। "तुम जाओगी" रमेश जी ने कड़े शब्दों में कहा। " तुमने जो किया वो बहुत ही गलत था। ऐसी उम्मीद हमें तुमसे बिल्कुल भी ना थी" प्रमिला जी ने दुःखी स्वर में कहा बात को आगे बढ़ाते हुए बोली " बेटा तुमने ज़िन्दगी भर के लिए हमारी आंखे झुका दी। हमें तुम पर बहुत भरोसा था और तुमने एक ही झटके में सब तोड़ दिया सिर्फ काम से घबरा कर तुम यहां चली अाई।" रिचा की आंखो से आंसू टपकने लगे पर कहा कुछ नहीं। शायद अपनी गलती का एहसास हो गया था या उसे अपने मम्मी पापा से ऐसी उम्मीद नहीं थी कुछ कहना अभी मुश्किल था।
अगले दिन सुबह 10 बजे जब घंटी बजने पर अविनाश जी ने दरवाज़ा खोला तो अमित के साथ तीनों को देखकर आश्चर्यचकित हो गए। समझने और संभलने में कुछ वक़्त लगा और आगे बढ़कर सबका स्वागत किया और अंदर आवाज़ लगाई देखो भई तुमसे मिलने कौन आया है और सबको आशा जी के कमरे की तरफ ले कर चल दिए। आशा जी भी चकित हो गईं उठने की कोशिश करने लगी तो प्रमिला जी ने आगे बढ़कर उन्हें रोका और वहीं उनके साथ बैठ कर हालचाल पूछने लगी। रिचा ने भी आगे बढ़कर पांव छू लिए और फिर बाहर आ गई। थोड़ी देर में रिचा चाय की ट्रे लेकर कमरे में ही आ गई। चाय पीते पीते ही प्रमिला जी ने अविनाश जी और आशा जी को सम्बोधित करते हुए कहा कि"हम आप से शर्मिंदा हैं रिचा की इस हरकत से। बच्चे हैं बचपने में कई गलतियां कर देते हैं पर ये हमारा फ़र्ज़ बनता है उन्हें समझाना। उम्मीद है आप उसे  इस नादानी के लिए माफ़ करेंगे ।"  आशा जी कुछ कहती इससे पहले ही अविनाश जी बोल उठे " अरे भाभी जी कैसी बातें कर रही हैं हमें कोई शिकायत नहीं। बच्चे हैं और धीरे धीरे सब सीख जायेंगे। वो अपनी  जगह सही थी शादी के एकदम बाद ऐसी स्थिति आ गई तो घबरा गई। वैसे तो इतने अच्छे से घर संभाल लिया है। क्यों रिचा बेटे मैं सही कहा रहा हूं ना ।"  रिचा ने कोई जवाब नहीं दिया सिर झुका कर बैठी रही। अब रमेश जी रिचा से मुखातिब हुए " देखो बेटे, अब ये घर तुम्हारे लिए पहले है। परिस्थिती से भागना कोई समाधान नहीं है। आज ये स्थिति है कल कुछ और समस्या आ सकती है वक़्त का कुछ पता नहीं चलता और फिर ज़िन्दगी में उतार चढ़ाव आते हैं पर इस तरह से घबरा कर भागने से कुछ नहीं होता।  एक बात और याद रखना वो घर अब भी तुम्हारा है हंसकर, सबकी खुशी और सहमति से आओगी तो दिल खोल कर तुम्हारा स्वागत है पर इस तरह से भाग कर आओगी तो ना मम्मी की और ना मेरी सपोर्ट मिलेगी। कोई दुख, कोई तकलीफ़ है तो वो भी ज़रूर बताओ हम तुम्हारे आगे खड़े हैं उस दुख तकलीफ़ को तुम तक पहुंचने से रोकने के लिए। उम्मीद है आगे से तुम हमे यूं नज़रे नीची ना करने दोगी।" रिचा चुपचाप बैठी रही आंखो से आंसू बरस रहे थे। प्रमिला जी से देखा ना गया उठ कर बेटी के पास गई और सिर पर हाथ फेरा। रिचा मां के गले लगी और फफक कर रो पड़ी। फिर सास ससुर कि तरफ देख कर बोली " आय एम सॉरी मां पापा आगे से ऐसी गलती ना होगी "। आशा जी ने अपनी तरफ बुलाया और गले से लगा लिया। अविनाश जी ने भी आगे बढ़ कर सिर पर हाथ फेरा दिया और मुस्करा दिए। " चलिए भाई साहब मौका भी है और दस्तूर भी
कुछ मीठा ले कर आते हैं"। अविनाश जी ने रमेश जी से कहा और दोनों महानुभाव बाहर चले दिए। रमेश जी अनुभवी व्यक्ति थे समझ गए कुछ अकेले में बात करना चाहते हैं। टहलते हुए अविनाश जी ने कहा" में पहले दिन से ही आप की बहुत इज्ज़त करता था पर आज वो इज्ज़त दोगुनी हो गई और मुझे अपने चुनाव पर बहुत गर्व हो रहा है"। रमेश जी बोले " नहीं नहीं ऐसी कोई  बात नहीं है  हम बस रिश्तों को सहेज कर रखना चाहते हैं। जानता हूं रिचा बहुत ही अच्छी लड़की है उसकी मम्मी ने उसे बहुत अच्छे संस्कार दिए हैं  पर आप जानते हैं घर में सबसे छोटी है तो लाड़ प्यार ज्यादा मिला है। और हम यह भी समझते हैं कि अब वो संभल कर चलेगी और दोबारा ऐसी गलती नहीं करेगी ऐसा हमारा विश्वास है। बच्चे हैं तो गलतियां करेंगे ही पर ये हमारा फ़र्ज़ है कि उन्हें सही राह दिखाएं और ज़िन्दगी की दुश्वारियों से भी बचाएं"। "बिल्कुल सही कहा आपने पर आपको लगता नहीं कि डोज कुछ ज्यादा ही गई" अविनाश जी ने कहा। " कभी कभी बीमारी पर काबू पाने के लिए कड़वी दवा की डोज देनी पड़ती है जो अक्सर फ़ायदा ही देती है"। रमेश जी ने कहा और दोनों समधी गलबहियां डाले आगे बढ़े।
" मम्मा चाय" रिचा की आवाज़ सुनते ही प्रमिला जी अचकचा उठी और फ़िर मुस्कराते हुए बैठ गईं । हमारी बिटिया समझदार हो गई है चाय का कप लेते हुए प्रमिला जी ने कहा। "वो तो पता नहीं पर उस दिन आप लोगों ने ये कठोर कदम ना उठाया होता तो शायद मुझे अपनी जिम्मेदारी का एहसास कभी ना होता और पापा का वो गुस्सा - तौबा तौबा अब मुझे कभी नहीं देखना" रिचा ने हंसते हुए कहा और पापा के गले से झूल पड़ी।

Tuesday, October 13, 2020

दिखावा

 

"अरे मम्मी कहां रह गई, जल्दी आओ भूख लगी है", पंकज ने आवाज़ लगाई। "आ रही हूं" मम्मीजी की आवाज़ आयी। "वो किचन साफ कर रही थी" मम्मीजी ने डाइनिंग टेबल पर बैठते हुए कहा। "क्यों तुम किचन साफ कर के नहीं आती" पंकज ने थोड़ा गुस्से से मुझसे पूछा।अभी मैं कुछ कहती कि गौरव, मेरे देवर, ने कहा" अरे भाई मॉम को काम करने की आदत है, काम नहीं भी होगा तो वो ढूंढ़ लेंगी तुम खाना खाओ"। मामला वहीं रफ़ा दफा हो गया। पर अब लग गया कि रात को फिर से लेक्चर शुरू हो जाएगा। "तुम करती क्या हो सारा दिन? जब देखो मम्मा ही लगी रहती हैं। थोड़ी हेल्प करा दिया करो। उनकी भी उम्र ही गई है। नहीं आता तो पूछ लिया करो पूछने से तुम छोटी तो नहीं हो जाओगी"।  वगैरा वगैरा।

मेरी और पंकज की शादी को सात महीने हुए थे। एक दो महीने तो यूंही गुजर गए पता ही नहीं चला। पर फिर घर की जिम्मेदारी उठाने लगी तो पता चलने लग गया कि लोगों के सामने तो मैं बेटी हूं पर मुझे तो अभी बहू का दर्जा भी नहीं मिला। घर में मुझे और पंकज को मिलाकर छह लोग थे - सास ससुर, देवर गौरव और ननद सौम्या। सब काम के लिए कामवाली लगी हुई थी जो बर्तन, सफाई कर जाती थी। कपड़े मशीन में धुलते थे और डस्टिंग खुद करते थे। सुनने में लग रहा है ना कि फिर दिक्कत क्या है? पर दिक्कत थी और सबसे बड़ी दिक्कत थी मम्मीजी का दिखावा। मैंने नोट किया कि जब भी पंकज घर पर होते तो मम्मीजी एक मिनट के लिए भी नहीं बैठती थी। कभी किचन में लगे हुए बर्तनों को ही इधर उधर करने लग जाती, कभी कपड़ा ले कर डस्टिंग करने लग जाती और कभी कुछ नहीं समझ आया तो मलाई से घी निकालने का काम शुरू हो जाता। जैसे ही पंकज अपने कमरे में जाते सब कुछ वहीं रखकर अपने कमरे में चली जाती और समेटना मुझे पड़ता।
घर में कोई मेहमान आने  पर मैं नमस्ते करके हाल चाल पूछकर चाय पानी के लिए किचन में घुसती तो मम्मीजी पीछे पीछे आ जाती। स्नैक्स वगैरा निकालने लग जाती मैं कहती कि मम्मीजी आप बैठिए वहां मैं ले आऊंगी तो जवाब आता पापा और पंकज बैठें हैं वहां पर। मुझे अजीब लगता कि अब दोनों का क्या काम क्या मैं चाय भी नहीं बना सकती पर जैसे ही मैं ट्रे उठाने लगती मम्मीजी मेरे हाथ से ट्रे ले लेती और कहती तुम किचन समेट लो और जल्दी से आ जाओ। अब अंदर जाकर डायलॉग मारा जाता कि थोड़ी ढीली है काम में इसीलिए मुझे देखना ही पड़ता है और बाद मम्मीजी की वाहवाही शुरू हो जाती जिसकी शुरुआत हमेशा पंकज करते। मुझे लगता किया तो मैंने सब और शाबाशी इन्हें मिल रही है पर तब ये नाटक समझ में नहीं आते थे।

पंकज के ऑफिस जाने से पहले मैं सुबह ५.३० बजे उठकर किचन में आकर सब्जी दाल दोनों बनाती थी और नाश्ते की तैयारी भी कर लेती थी । गौरव और सौम्या भी लंच लेकर जाते थे तो उनका भी लंच तैयार रहता था। सात बजे तक मेरा काम खतम हो जाता था सिर्फ चपाती बनानी रह जाती थी । फिर मैं चाय बनाकर मम्मी पापा को देकर अपनी और पंकज की चाय कमरे में ले जाती। वहीं चाय पीते पीते मैं कमरा समेटती जाती और पंकज तैयार होते रहते लेकिन जब तक मैं किचन में जाती मम्मीजी किचन में घुस जाती और सबको आवाज़ें लगाना शुरू कर देती आ जाओ मैंने लंच पैक कर दिया है। गौरव और सौम्या तो कुछ ना कहते पर पंकज शुरू हो जाते "अरे मम्मा आप सुबह सुबह क्यों लग जाते हो नेहा को करने दिया करो आप आराम से उठा करो"। और मम्मीजी का जवाब आता " कोई बात नहीं बेटा कितना टाइम लगता है ये सब करने में अब तो आदत हो गई है काम करने की, आराम तो मरने के बाद ही होगा" और पंकज का घूरना और मेरा सुलग जाना एक साथ होता था।

पर धीरे धीरे सब समझ में आने लगा कि ये सब पंकज को दिखाने के लिए किया जाता है यानी पंकज घर पर है तो एक मिनट भी नहीं बैठना और पंकज घर पर नहीं है तो पानी का ग्लास भी नहीं उठाना। और पंकज इतने मात्रभक्त कि में कुछ बोलती तो विश्वास ही नहीं करना ऊपर से सुनने को मिलता मम्मी से सीखो घर चलाना। अब कितना बोलती और क्या बोलती क्योंकि पंकज वहीं बोलते थे जो देखते थे। गौरव मुझे कितना बार बोलता " भाभी बोलना सीखो सब काम करती हो तो बताया भी करो भाई को" और मेरा कहना था कि काम कोई दिखावे के लिए किया जाता है क्या? घर का ही तो काम कर रहे हैं और घरवालों के ही आगे ढोल बजाएं। पर अब शायद मैं ही गलत थी क्योंकि पंकज को सिर्फ मम्मीजी काम करते हुए दिखती थी और मैं आराम करते हुए। लेकिन अब मुझे कोफ्त होने लगी थी इस दिखावे से। हम पति पत्नी के बीच और कोई प्रॉब्लम नहीं थी, पंकज बहुत ही केयरिंग थे पर मां को लेकर उतने ही पोजेसिव और मम्मीजी इस बात का पूरा फायदा उठाती थी। पानी अब सिर के ऊपर से गुजरने लगा था रोज़ की वहीं मेरी और पंकज की  किचकिच। मुझे लगने लगा था या तो मैं भी दिखाकर काम करना शुरू कर दूं या फिर पंकज को वास्तविकता से अवगत कराऊं।

अगले दिन डिनर शुरू होने से पहले मैंने पंकज को बुलाया और कहा देख लो कुछ बाकी है करने को सब कुछ साफ़ सुथरा और जगह पर है ना..? पंकज ने आश्चर्य से मेरी तरफ देखा और कुछ पूछने से पहले मैंने कहा " अभी २-३ दिन बाद इसका जवाब आपको खुद मिल जाएगा बस कुछ बोलो मत"।  चार दिन तक मैं रोज़ पंकज को बुलाकर किचन दिखा देती। पंकज को अब कुछ कुछ समझ में आने लग गया था क्योंकि मम्मीजी का रोज़ का वहीं डायलॉग होता था "किचन समेट रही हूं" ।  एक दिन सभी डाइनिंग टेबल पर आ गए पंकज ने आवाज़ लगाई और मम्मीजी का जवाब आया " आ रही हूं किचन थोड़ी समेटनी रह गई है" मेरी और पंकज की नजर मिली पंकज गुस्से से उठे किचन में जाकर पूछा क्या समेट रही हो। बस खाना बनाना ही थोड़ा ना काम होता है समेटना भी पड़ता है.. मम्मीजी का जवाब आया। "तो समेटने के लिए आपको क्या मिला, में अभी देखकर गया हूं और पिछले चार दिनों से देख रहा हूं एक चम्मच भी नहीं पड़ा रहता" । मम्मीजी एकदम सकपका गई क्योंकि उन्हें विश्वास ही नहीं रहा था कि पंकज ऐसा भी बोल देगा। पीछे मैं खड़ी थी मम्मीजी की नजरें मुझसे मिली और वो चुपचाप टेबल की तरफ चल दी। मैंने पापाजी की तरफ देखा और आंखों ही आंखों में धन्यवाद् दिया....,क्योंकि ये आइडिया उन्हींका ही था।