Tuesday, May 31, 2016




माँ

खुशियों  का  संसार  दिया  आपने ,
 ज़िन्दगी  को  संवार  दिया  आपने ;
 ज़िन्दगी  एक सोपान  है , बताया  आपने , 
इस  पर  चलना  सिखाया  आपने :
करते  हैं  आभार  प्रकट  हम  ईश्वर   का ,
जिसने  अपना  रूप  दिखाया  आपमें 


माँ - कितना प्यारा, कितना मधुर ममत्व से भरपूर शब्द है.  सारी दुनिया इसी शब्द में ही समाई है. सोचिेए - माँ न होती तो -- दुनिया ही न होती न. क्यों कहते हैं - माँ  का आँचल तो है ही शांति पाने के लिए.  रोना है तो माँ का आँचल - मुझे याद आ रहा है कुछ दिन पहले बिटिया घर में घुसी शाम को - मैं बैठी थी - आयी मेरे पास बोली "मम्मा रोने का मन हो रहा है" मैंने पुछा क्यों , क्या हुआ तबियत तो ठीक है न ? ऑफिस में किसी ने कुछ कहा, रास्ते में कुछ हुआ - यानि प्रश्नों की झड़ी.  बोली नहीं, कुछ भी नहीं हुआ बस रोने का दिल है.  मैंने कहा तो सोचना क्या रो लो हल्की हो जाओगी और वो फूट फूट कर रोने लगी.  पांच-सात मिनट रोयी और फिर हंसने लगी.  मुझे याद आ गया अपना बचपन में मैं भी तो ऐसे ही करती थी. किसी भी बात पर या बिना बात पर रोने लग जाती थी और फिर माँ के आगे रो लिया और दुःख के बादल छंट गए.  न माँ पूछती थी क्यों रोयी और न मुझे पता होता था कि मैं क्यों रोयी.

कभी  सोचती थी कि मम्मी नहीं होगी तो क्या होगा, मैं तो शायद ज़िंदा भी नहीं रह पाऊंगी.  कुछ ख़ुशी की बात होती तो सबसे पहले फ़ोन मम्मी को - मम्मी की आवाज़ ख़ुशी से भरी  हुई सुनने को मिलती तो ख़ुशी और बढ़ जाती. कुछ परेशानी  होती, कोई समस्या होती तो सबसे पहले मम्मी की याद आती - फ़ोन करती और समस्या का कोई न कोई हल तो मिल ही जाता.  इतनी तसल्ली देती कि लगता था बाद में "लो मैं तो यूँ ही परेशान हो रही थी".  बस यही माँ होती है.

साँसे चल रही हैं, जीवन आगे बढ़ रहा है पर एक खालीपन तो है ही जो अब कभी नहीं भरी जायेगा.

शायद हर रिश्ते कि साथ ऐसा होता है, हर रिश्ते की अपनी एहमियत होती है. पर ऐसा इसलीये होता है न कि हम कहीं न कहीं उस से इतना जुड़ जाते हैं कि अलगाव की कल्पना करते ही आँखे आँसूओ से भर जाती हैं. अब बस यादें  ही यादें  रह गयी हैं.  न  रोने के लिए मां का कन्धा  है न माँ की गोदी  है बस एक खालीपन है जो जीवन में रह गया है और अंतिम  सांस  के साथ ही ख़त्म  होगा. 

Thursday, May 19, 2016

तनाव

         

  

तनाव 


           आज की युवा पीढ़ी किस ओर जा रही है, यह उन्हें खुद ही पता नहीं है.  उनकी ज़िन्दगी में आज सिर्फ एक ही चीज़ रह गई है ओर वह है - तनाव.  इतनी तनावपूर्ण ज़िन्दगी है आज की युवा पीढ़ी कि वो इस तनाव को झेल ही नहीं पाती कभी कभी ओर फिर ऐसा कदम उठा लेती है जो उन पर और उनके परिवार पर भारी पड़ता है.  क्योंकि तनाव जब सर तक पहुँच जाता है तो उन्हें खुद ही नहीं पता चलता कि वो अब क्या कदम उठाने वाले हैं.

          और इन सबका कारण एक ही है - और वो है आज कि मशीनी ज़िन्दगी जिसकी रफ़्तार हर रोज़  बढ़ रही है और युवा पीढ़ी उस रफ़्तार के साथ कदम बढ़ाते बढ़ाते हांफने लग जाती है.  प्रतियोगिता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है - सब कुछ चाहिए – पैसा, घर, गाडी, विदेश में नौकरी ब्रांडेड चीज़े यानि सब कुछ और वो भी रातो-रात.  इंतज़ार तो करना आता ही नहीं है और न करना चाहते हैं. सब कुछ एकदम हासिल होना चाहिए.  और जब ये सब नहीं मिलता तो तनाव घर करने लगता है.

          मुझे याद है कि हम भी पढ़ते थे सोचते थे नौकरी करने का पर इस तरह से तनाव नहीं पालते थे.  सब कुछ बना लेते थे, हाँ रफ़्तार ज़रूर धीमी थे पर तनाव नहीं पालते थे.  और अगर दार्शनिक अंदाज़ में कहा जाए तो तनाव मिलता था पर ये सब होडबाजी न थी.

         जीवन है तो संघर्ष भी है - संघर्ष करना है तो जीना भी है - जीना है तो जीवन को सफल बनाना है -  जीवन को सफल बनाना है तो कदम बढ़ाना है - कदम बढ़ाना है तो रास्ता ढूंढना है - रास्ता ढूंढना है तो मंज़िल का भी पता होना चाहिए , मंज़िल का पता है पर राह कठिन है, राह कठिन है तो उससे आसान भी  बनाना है और ये सब करने के लिए हौसला, धैर्य  की ज़रुरत है.  और - बस यही युवा पीढ़ी के पास नहीं है.


         आप सड़क पर निकलिए और युवाओ को देखिये ऐसी रफ़्तार से गाड़ी चलाते हैं कि कई बार लगता है कि साथ से कोई आंधी गुजर गयी.  रूल्स-रेगुलेशंस क्या होते हैं - ये उनके लिए नहीं बने हैं.  रूल्स तोड़ने में अपनी शान समझते हैं और फिर शान से बोलेंगे भी कि "मैंने तो रेड लाइट जम्प की ट्रैफिक वाले ने रोक और मैंने एक १०० का पत्ता उसकी हथेली में रख."  और ये सब होता है.  पर अगर गहरायी से देखिये तो दोषी कौन है - पता चल जायेगा.  हम, यानि माँ-बाप, समाज जो अपने बच्चों को रोकने की बजाय उन्हें बढ़ावा देते हैं.  कुछ गलत काम करते हैं तो उन्हें सजा देने के बदले कुछ भी करके उन्हें बचाने की कोशिश करते हैं.