माँ
खुशियों का संसार दिया आपने ,
ज़िन्दगी को संवार दिया आपने ;
ज़िन्दगी एक सोपान है , बताया आपने ,
इस पर चलना सिखाया आपने :
करते हैं आभार प्रकट हम ईश्वर का ,
जिसने अपना रूप दिखाया आपमें
माँ - कितना प्यारा, कितना मधुर ममत्व से भरपूर शब्द है. सारी दुनिया इसी शब्द में ही समाई है. सोचिेए - माँ न होती तो -- दुनिया ही न होती न. क्यों कहते हैं - माँ का आँचल तो है ही शांति पाने के लिए. रोना है तो माँ का आँचल - मुझे याद आ रहा है कुछ दिन पहले बिटिया घर में घुसी शाम को - मैं बैठी थी - आयी मेरे पास बोली "मम्मा रोने का मन हो रहा है" मैंने पुछा क्यों , क्या हुआ तबियत तो ठीक है न ? ऑफिस में किसी ने कुछ कहा, रास्ते में कुछ हुआ - यानि प्रश्नों की झड़ी. बोली नहीं, कुछ भी नहीं हुआ बस रोने का दिल है. मैंने कहा तो सोचना क्या रो लो हल्की हो जाओगी और वो फूट फूट कर रोने लगी. पांच-सात मिनट रोयी और फिर हंसने लगी. मुझे याद आ गया अपना बचपन में मैं भी तो ऐसे ही करती थी. किसी भी बात पर या बिना बात पर रोने लग जाती थी और फिर माँ के आगे रो लिया और दुःख के बादल छंट गए. न माँ पूछती थी क्यों रोयी और न मुझे पता होता था कि मैं क्यों रोयी.
कभी सोचती थी कि मम्मी नहीं होगी तो क्या होगा, मैं तो शायद ज़िंदा भी नहीं रह पाऊंगी. कुछ ख़ुशी की बात होती तो सबसे पहले फ़ोन मम्मी को - मम्मी की आवाज़ ख़ुशी से भरी हुई सुनने को मिलती तो ख़ुशी और बढ़ जाती. कुछ परेशानी होती, कोई समस्या होती तो सबसे पहले मम्मी की याद आती - फ़ोन करती और समस्या का कोई न कोई हल तो मिल ही जाता. इतनी तसल्ली देती कि लगता था बाद में "लो मैं तो यूँ ही परेशान हो रही थी". बस यही माँ होती है.
साँसे चल रही हैं, जीवन आगे बढ़ रहा है पर एक खालीपन तो है ही जो अब कभी नहीं भरी जायेगा.
शायद हर रिश्ते कि साथ ऐसा होता है, हर रिश्ते की अपनी एहमियत होती है. पर ऐसा इसलीये होता है न कि हम कहीं न कहीं उस से इतना जुड़ जाते हैं कि अलगाव की कल्पना करते ही आँखे आँसूओ से भर जाती हैं. अब बस यादें ही यादें रह गयी हैं. न रोने के लिए मां का कन्धा है न माँ की गोदी है बस एक खालीपन है जो जीवन में रह गया है और अंतिम सांस के साथ ही ख़त्म होगा.

