यादें-
बचपन - मधुर - सरल-खिलखिलाता बचपन-एक एहसास, मधुर यादें-हर गम से दूर-बचपन - कितना मीठा शब्द है. सब चिंताओं से मुक्त-खुले आसमान में विचरण करने वाला. रूठना, फिर मानना, गिरना-रोना और फिर सब कुछ भूल कर खिलखिलाना यही तो है बचपन. आँख खुली तो एक सपना कि आज तो बस मस्ती. यही है न - बचपन.
पता नहीं क्यों आजकल पुरानी यादें मुझे हमेशा घेर लेती हैं. कभी याद आता है वो उंठखान वाला नानी का घर तो कभी याद आता है अपना छोटा सा घर. खर के बिलकुल सामने स्कूल और फिर गुस्सा आता था कि स्कूल इतना पास क्यों है, क्योंकि लंच के लिए घर आना पड़ता था. लगता है अच्छी यादें बस पीछे छूट गयी हैं और अबी बस दर्द ही बाकी रह गया है दर्द भी ऐसा कि जब तक जीवन - दर्द होता ही रहेगा - कोई दवा कोई दुआ काम नहीं करेगी. कोई शरीर का रोग थोड़े ही न है जो काम हो जायेगा. मन का दर्द है - ज़िन्दगी के साथ ही ख़त्म होगा.
सोचती हूँ - हम रिश्तों में क्यों बंधते हैं ? क्यों मोह-माया में फंसते हैं, क्यों किसी के बिछुड़ने पर सोचते हैं कि अब हमारा जीवन भी ख़त्म हो जाए - न दर्द हो न उसका एहसास हो. पर ऐसा होता नहीं है न. जवाब भी खुद को दे देती हूँ - रिश्ते हैं तो जीने की इच्छा है. मोह-ममता है तभी तो आशा है. यह सब न हो तो फिर किसलिए जीना.
याद आता है नानी का घर. नानी का प्यार, नाना का दुलार, मां-मासियों से लाड जो आज तक बना बस वक़्त के धुल ने उन्हें धूमिल कर दिया है.
दिल्ली जब शिफ्ट हो गए तब बस गर्मी की छुटियोंका इंतज़ार रहता है कि कब छुटियाँ हों और हम जाएँ - नानी के घर. जहाँ होती थी बस मस्ती ही मस्ती . हम ही हम होते थे. लाड-प्यार, दुलार क्या नहीं मिलता था. जो चीज़ बॉटल शाम तक हाज़िर. मम्मी कुछ कह नहीं सकती थी क्योंकि भई नानी का हाथ हमारे सिर पर होता था.
कहाँ गयी सब यादें? आज के बच्चों ने वैसा जीवन तो देखा ही नहीं हा. बस मोबाइल, PC net wts up इन्ही में उलझे रहते हैं. चिंता - पैसा खर्च करने की पर पैसा तभी खर्च होगा जब जेब में होगा. और जेब इतनी बड़ी कि कारूँ का खज़ाना भी काम पड़े तो फिर शांति कहाँ से आये.
समय रेत कि तरह फिसल रहा है. कितना कुछ छूट गया , कितने अपनों ने साथ छोड़ दिया और अब तो यह हालत है कि पता ही नहीं कब कैसी खबर आये, किसी अपने कि बिछुड़ने कि बारी आये - पता ही नहीं. मुझे लगता है शायद मैं झेल न पाऊँ पर पता है - झेलना लिखा है तो झेलना तो पड़ेगा ही.
हमने जन्म क्यों लिया? न लेते तो क्या होता? जीवन में क्या पाया? पिछले जन्म में क्या थे? अगला जन्म कैसा होगा- अनगिनत प्रश्न मन में आते है और मैं धीरे से पुचकार कर प्रश्नो को वापिस भेज देती हूँ - जवाब ही नहीं है. सब की परिभाषा अलग अलग है. कोई खुश है भी क्या? सबका अपना अपना ख्याल है. दर्द हर एक के साथ जुड़ा है - बस सहने की सीमा सबकी अपनी अपनी है. मालूम है कि हम सबने जाना है. अपना सोचते हैं तो लगता है ठीक है किसी दिन - जब समय लिखा होगा तो चले जायेंगे. पर यही बात जब अपने किसी से जुडी हो तो हम सहने कि भी क्षमता नहीं रक्ते. सोच ही नहीं सकते. एकदम से कोई चला जाए तो लगता है कि अभ तो हम भी नहीं रह पाएंगे. पर जब कोई आपके सामने ऐसे हालात में हो कि अब पता नहीं क्या समाचार आये तो सोचिेये दिल की हालत को. वो जयादा दुखदायी होता है. रात-बेरात फ़ोन की घंटी बजी और आपके दिल की धड़कन बड़ी. मन को कहीं भी शांति नहीं मिलती. शांति तो कहते है मन के अंदर होती हैं - पर जब मन ही अशांत हो तो.....

2 comments:
Dhanyawad Bachpan Me Fir Se Ghumane Ke Liye !!!
Namaste shippy ji.
aap ek achhi lekhika hain...vichaaron aur shabdon ko bunkar bhavaano ke satrangi aasmaan me vicharan karti hain isliye ye khyaal aapko kurdte hain...
.man ki inhi bhaavnaao ko isee tarah se sanjo kar aap hame aur apne antar man ko sunder rachnaayen zaroor dengi yahi oomeed hai aapsey..
...aapki bhaavi rachnaaon ke intezarr me
-renu ahuja
www.kavyagagan.blogspot.com
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