मैं उम्र के पांच दशक पार कर चुकी हूँ. पढने का अत्याधिक शौक होने का कारण मैं कितनी ही पत्रिकाएं पढती हूँ पर आज तक कलम उठा कर कभी अपने भावो को व्यक्त नहीं किया पर आप के शीर्ष लेख "तेजाब से झुलसे खवाब" ने मुझे इतना झकझोर दिया है कि आज लिखने पर मजबूर हो गयी
शीर्ष लेख पढ़ कर लगा के हम महिलाओं
के ख़वाब ऐसे ही झुलसाए जाते हैं कभी तेजाब से तो कभी बलात्कारियों की दरिंदगी से. एक खूबसूरत
चेहरा कैसे एक ही पल में एक मांस के लोथड़े
में तब्दील होता है यह सोनाली को देख कर ही एहसास होता है पर हैरानी से अधिक दुःख होता
है इस बात से कि शीर्ष स्तर पर महिलाओं के होने का बावजूद महिलाएं ही सबसे ज्यादा प्रताड़ित
हैं और इसके लिए हम महिलाएं ही जिम्मेदार हैं क्यों एक महिला दूसरी महिला पर अत्याचार
करती है या अत्याचार होते हुए देखती है, क्यों नहीं हम एक दूसरे का सहारा बनती. वजह
साफ़ है - हमारी आवाज़ में ही वो दम, वो दहाड़, वो चिंगारी नहीं है जो एक क्रांति का रूप
धारण कर सके क्योंकि हमारी कानून व्यवस्था ही खोखली है. इस पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं
को सम्मान मिलना तो दूर की बात है उन्हें न्याय ही नहीं मिलता. क्यों नहीं ऐसे व्यक्तियों
के लिए कड़े कानून बनाये जाते हैं, क्यों नहीं उन्हें ऐसी सजा दी जाती है जो बाकी लोगों
के लिए दहशत का काम करे. क्यों उन्हें जमानत पर छोड़ा जाता है, एक बार ही ऐसा किया जाए
कि उन पर थोडा सा तेजाब छिड़क दिया जाए जो कम से कम उन्हें एहसास तो दिलाये कि झुलसना
क्या होता है.
सोनाली का कहना बिलकुल तर्कसंगत है कि हम चाहे
कितना ही आर्थिक विकास कर लें पर नारी का सम्मान ही नहीं कर पाते, उसे सुरक्षा नहीं
दे सकते तो बाकी का विकास हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता. आज ज़रुरत है व्यवस्था को बदलने की, सोच को बदलने
की अगर स्वस्थ समाज चाहिए तो सोच को भी स्वस्थ बनाना होगा. और अंत में ..........
मंजिल तक पहुँचने के लिए ख़ुद पाँव बढ़ाना होगा।
रोशनी पाने के लिए
मुझे ख़ुद को जलाना होगा
शक्तिपुंज हूँ मैं एक नए समाज का निर्माण करना होगा
यह मत भूलना तुम मैं नारी
हूँ
न हारी हूँ मैं कभी---न हारूंगी कभी

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