आज की जिंदगी
जीवन क्या है ? इसका उत्तर तो शायद ही किसी के पास हो. हर व्यक्ति की परिभाषा अलग होगी. कुछ दिन पहले कुछ अच्छा हुआ तो जीवन बहुत सुंदर है - स्वर्ग के समान और कुछ बुरा हुआ तो भई कांटो भरा जीवन है. खोया कुछ ज्यादा, पाया कुछ कम.
याद आता है बचपन का ज़माना. एकदम खुशनुमा, मस्ती से भरपूर , न कोई चिंता न कोई निराशा. बस अलमस्त सा जीवन. पेड़ो पर चढ़ना, लुक छिपी खेलना, रस्सी कूदना, साइकिल चलाना, दोस्तों के साथ मस्ती, लड़ाई झगडा, रूठना मनाना सब चलता था और लगता था कि यही है जीवन. बड़े हुए थोड़ी चिंता बड़ी - पढाई की. पर ऐसा टेंशन भी नहीं था कि क्या करेंगे. हमारे समय में मुझे लगता था कि आजकल के समान कम्पटीशन नहीं था. अच्छे नंबर लाना है बस यही चाह होती थी और उतनी मेहनत तो कर ही लेते थे.
आजकल के बच्चे जहाँ दो-चार साल के हुए कि नहीं माँ-बाप को ज्यादा फ़िक्र हो जाती है कि अब बच्चे को कौन से प्ले स्कूल में डाला जाये. और फिर शुरू होता है एक दुस्वप्न बच्चे के लिए. सुबह जल्दी उठना जबरदस्ती कुछ पेट में डालना, मूड है या नहीं इससे माँ-बाप को कुछ मतलब नहीं, स्कूल वैन में जाना आदि आदि. यानि टार्चर ही टार्चर. उस पर तुर्रा यह कि कुछ कम प्रगति दिखाई दी तो माँ-बाप कि तो शरम के मारे नाक ही कट गयी.
असल में mahtavakaanshaa ने ही आज की ज़िन्दगी को इतना बोझिल कर दिया है. कम समय में ज्यादा पा लेना, संतुष्टि (शांति) का अभाव - ये है आज के समाज की देन.आजकल हर व्यक्ति सब कुछ एकदम जल्दी जल्दी पा लेना चाहता है. घर है पर अब बड़ा चाहिए. गाडी है पर अब बड़ी लेनी है, कपडे, घड़ियाँ, जूते सब ब्रांडेड ही चाहिए. होड़, होड़ और बस होड़. सप्ताहांत तो बाहर ही मनाना है. पिक्चर, मॉल, लंच बाहर तो डिनर फाइव स्टार में. दो दिन तो भई रिलैक्स करना है और यही है रिलैक्स की परिभाषा - जस्ट चिल्ल आउट. सब कुछ है पर 'कुछ' भी नहीं. यह 'कुछ' क्या है - मन की शांति है जो आज की पीढ़ी के पास है ही नहीं. भागदौड़ भरी ज़िन्दगी. सुबह सुबह ऑफिस के लिए निकल जाना है. जाने का टाइम फिक्स है पर आने का तो बिलकुल भी नहीं है. १० भी बज सकते है, ११ भी और १२ भी. थकान इतनी ज्यादा कि दो बातें करने का भी मूड नहीं होता, बच्चे या तो सो चुके होते हैं या फिर टी.वी/कंप्यूटर में आँखें गडाये हुए होते हैं. थकान उतारने के लिए १-२ पेग भी जरूरी हैं तो साथ भी चाहिए तो फिर आजकल की पत्निया किस से कम हैं भई. कंधे से कंधे मिलकर चल रही हैं, आधुनिक समाज की हैं तो इन बातों में क्यों पीछे रहें.
मुझे याद है, मुझे क्या हमारी पीढ़ी के सभी लोगों को याद होगा कि जब हम छोटे थे तो हमारी दुनिया बस माँ के आगे-पीछे ही घूमा करती थी. स्कूल के आये तो माँ दिखनी चाहिए, रोना है तो माँ का आँचल चाहिए होता था, हँसना होता था तो चाहते थे कि माँ साथ में खिलखिलाए. रूठना, मचलना, जिद पकड़ना, रोना, हँसना, खाना सब के लिए बस माँ. और माँ की दुनिया उसके बच्चे. बच्चों को अच्छे संस्कार माँ ही डालती थी. कोई आया आपके घर और आपने नमस्ते नहीं की तो -"क्यों नहीं किया विश ये बातें भी अब तुम्हे समझनी पड़ेंगी" मतलब नाक ही कट गयी. पानी का गिलास मेहमानों के सामने रखा तो बाद में आ गयी शामत - "गिलास धोया क्यों नहीं था" ये भी समझाना पड़ेगा" और हम आज तक समझे हुए हैं.
अब आज की मॉडर्न मम्मी को तो खुद ही खाना बनाना , घर को घर नहीं बनाना आता तो बाकी की उम्मीद तो छोड़ ही दीजिये.
जीवन क्या है ? इसका उत्तर तो शायद ही किसी के पास हो. हर व्यक्ति की परिभाषा अलग होगी. कुछ दिन पहले कुछ अच्छा हुआ तो जीवन बहुत सुंदर है - स्वर्ग के समान और कुछ बुरा हुआ तो भई कांटो भरा जीवन है. खोया कुछ ज्यादा, पाया कुछ कम.
याद आता है बचपन का ज़माना. एकदम खुशनुमा, मस्ती से भरपूर , न कोई चिंता न कोई निराशा. बस अलमस्त सा जीवन. पेड़ो पर चढ़ना, लुक छिपी खेलना, रस्सी कूदना, साइकिल चलाना, दोस्तों के साथ मस्ती, लड़ाई झगडा, रूठना मनाना सब चलता था और लगता था कि यही है जीवन. बड़े हुए थोड़ी चिंता बड़ी - पढाई की. पर ऐसा टेंशन भी नहीं था कि क्या करेंगे. हमारे समय में मुझे लगता था कि आजकल के समान कम्पटीशन नहीं था. अच्छे नंबर लाना है बस यही चाह होती थी और उतनी मेहनत तो कर ही लेते थे.
आजकल के बच्चे जहाँ दो-चार साल के हुए कि नहीं माँ-बाप को ज्यादा फ़िक्र हो जाती है कि अब बच्चे को कौन से प्ले स्कूल में डाला जाये. और फिर शुरू होता है एक दुस्वप्न बच्चे के लिए. सुबह जल्दी उठना जबरदस्ती कुछ पेट में डालना, मूड है या नहीं इससे माँ-बाप को कुछ मतलब नहीं, स्कूल वैन में जाना आदि आदि. यानि टार्चर ही टार्चर. उस पर तुर्रा यह कि कुछ कम प्रगति दिखाई दी तो माँ-बाप कि तो शरम के मारे नाक ही कट गयी.
असल में mahtavakaanshaa ने ही आज की ज़िन्दगी को इतना बोझिल कर दिया है. कम समय में ज्यादा पा लेना, संतुष्टि (शांति) का अभाव - ये है आज के समाज की देन.आजकल हर व्यक्ति सब कुछ एकदम जल्दी जल्दी पा लेना चाहता है. घर है पर अब बड़ा चाहिए. गाडी है पर अब बड़ी लेनी है, कपडे, घड़ियाँ, जूते सब ब्रांडेड ही चाहिए. होड़, होड़ और बस होड़. सप्ताहांत तो बाहर ही मनाना है. पिक्चर, मॉल, लंच बाहर तो डिनर फाइव स्टार में. दो दिन तो भई रिलैक्स करना है और यही है रिलैक्स की परिभाषा - जस्ट चिल्ल आउट. सब कुछ है पर 'कुछ' भी नहीं. यह 'कुछ' क्या है - मन की शांति है जो आज की पीढ़ी के पास है ही नहीं. भागदौड़ भरी ज़िन्दगी. सुबह सुबह ऑफिस के लिए निकल जाना है. जाने का टाइम फिक्स है पर आने का तो बिलकुल भी नहीं है. १० भी बज सकते है, ११ भी और १२ भी. थकान इतनी ज्यादा कि दो बातें करने का भी मूड नहीं होता, बच्चे या तो सो चुके होते हैं या फिर टी.वी/कंप्यूटर में आँखें गडाये हुए होते हैं. थकान उतारने के लिए १-२ पेग भी जरूरी हैं तो साथ भी चाहिए तो फिर आजकल की पत्निया किस से कम हैं भई. कंधे से कंधे मिलकर चल रही हैं, आधुनिक समाज की हैं तो इन बातों में क्यों पीछे रहें.
मुझे याद है, मुझे क्या हमारी पीढ़ी के सभी लोगों को याद होगा कि जब हम छोटे थे तो हमारी दुनिया बस माँ के आगे-पीछे ही घूमा करती थी. स्कूल के आये तो माँ दिखनी चाहिए, रोना है तो माँ का आँचल चाहिए होता था, हँसना होता था तो चाहते थे कि माँ साथ में खिलखिलाए. रूठना, मचलना, जिद पकड़ना, रोना, हँसना, खाना सब के लिए बस माँ. और माँ की दुनिया उसके बच्चे. बच्चों को अच्छे संस्कार माँ ही डालती थी. कोई आया आपके घर और आपने नमस्ते नहीं की तो -"क्यों नहीं किया विश ये बातें भी अब तुम्हे समझनी पड़ेंगी" मतलब नाक ही कट गयी. पानी का गिलास मेहमानों के सामने रखा तो बाद में आ गयी शामत - "गिलास धोया क्यों नहीं था" ये भी समझाना पड़ेगा" और हम आज तक समझे हुए हैं.
अब आज की मॉडर्न मम्मी को तो खुद ही खाना बनाना , घर को घर नहीं बनाना आता तो बाकी की उम्मीद तो छोड़ ही दीजिये.

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