था एक मासूम खिलंदड़ा बचपन
डैनो में दम था मुक्त गगन में विचरता था
कौतुक आँखों से दुनिया की सैर करता था
नशे की इक बदली सी आयी
तन, मन धन सब पर छाई
न डैनो में दम रहा न मन पर बस रहा
मैं तो बस नशे का एक गुलाम बन कर रह गया
नशा मुक्ति केंद्र में जाकर अनायास मेरे मन में ये विचार आ गए मासूम बच्चों को इस लत का शिकार बनते देखा. लगा क्या है इनका जीवन, क्यों ये ऐसी लत का शिकार हुए हैं जो इन्हें चोरी, डाका, हत्या जैसे कुकर्मो को करने के लिए प्रेरित करती है. बचपन तो मासूम होता है, इन सबसे अनजान होता रहता है पर सौदागरों को इन सबसे कुछ लेना देना नहीं होता उन्हें सिर्फ अपनी तिजोरिओं को भरना होता है वो चाहे किसी भी तरीके से भरी जाए किसी का बचपन छीनता है किसी की जवानी घुलती है, किसी का बचपन छीनता है, किसी का बुढ़ापा ख़राब होता है इन सबसे उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता. जिन्हें नशे की लत लग जाती है उन्हें हर समय अपनी नशे की खुराक चाहिए, न मिले तो वो इस नशे के इतने गुलाम बन जाते हैं कि इसके लिए वे चोरी और हत्या करने में भी पीछे नहीं हटते. क्योंकि तब इन्हें सिर्फ एक ही चीज़ चाहिए, तब अपने मन पर भी इनका कोई बस नहीं रहता, शरीर को भी इसकी इतनी आदत हो जाती है कि थोड़ी देर होने से ही शरीर अकड़ने लगता है, जबान ऐंठने लगती है, आँखों में खुमार सा छाने लगता है यानि कि मन और शरीर को इस नशे के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता
पर इन सबसे बचने का उपाय क्या है? जब नशे का उत्पादन ही न हो तो हमें इन नशा मुक्ति केंद्र को खोलने की आवयश्कता क्यों होती ? सरकार अपने कर्तव्यो की पूर्ती सिर्फ एक वैधानिक चेतावनी दे कर ही लेती है कि १८ वर्ष से कम उम्र के बच्चो को बीडी, सिगरेट बेचना कानूनन जुर्म है. सरकार इन सबका उत्पादन क्यों नहीं बंद करती, क्यों अफीम, चरस, तम्बाकू का उत्पादन भारत में सबसे ज्यादा होता है क्यों नहीं इन शराब बिक्री केन्द्रों को बंद किया जाता है. क्यों ऐसी कंपनियो को लाइसेंस दिए जाते हैं जिन्हें इन्ही शराब कि बिक्री में करोडो का फायदा होता है
वजह साफ़ है कि सरकार को सबसे ज्यादा फायदा इन्ही स्रोतों से प्राप्त होती है. क्यों नहीं कानून को इतना कड़ा बना दिया जाता है की जो व्यक्ति इस नशे को बेचता नज़र आये/पकड़ा जाए उसे इतनी सख्त सजा दी जाए कि बाकी लोग इससे इक सबक ले .
लेकिन सरकार को ही दोष देने से काम नहीं चलेगा. परिवार की भी अपनी इक भूमिका होनी चाहिए बच्चो को इतना प्यार, अपनत्व, ममत्व परिवार से मिले कि वो खुद ही इस लत से दूर रहे. उसे इससे होते वाली हानियों के बारे में इतनी जानकारी दी जाए कि वो स्वंय ही समझ जाए कि उसका भविष्य इस नशे में अँधेरे के गर्त में ही जा सकता है. परिवार का मुखिया यदि इन सब चीज़ों को खुद ही उपयोग करता है, खुद ही नशे का गुलाम है तो बच्चो को क्या सीख देगा
