Friday, June 21, 2013

संपादक के नाम


मैं उम्र के पांच दशक पार कर चुकी हूँ.  पढने का अत्याधिक शौक होने का कारण मैं कितनी ही पत्रिकाएं पढती हूँ पर आज तक कलम उठा कर कभी अपने भावो को व्यक्त नहीं किया पर आप के शीर्ष लेख "तेजाब से झुलसे खवाब" ने मुझे इतना झकझोर दिया है कि आज लिखने पर मजबूर हो गयी

शीर्ष लेख पढ़ कर लगा के हम महिलाओं के ख़वाब ऐसे ही झुलसाए जाते हैं कभी तेजाब से तो कभी बलात्कारियों की दरिंदगी से.  एक खूबसूरत चेहरा कैसे एक ही पल में एक मांस के लोथड़े में तब्दील होता है यह सोनाली को देख कर ही एहसास होता है पर हैरानी से अधिक दुःख होता है इस बात से कि शीर्ष स्तर पर महिलाओं के होने का बावजूद महिलाएं ही सबसे ज्यादा प्रताड़ित हैं और इसके लिए हम महिलाएं ही जिम्मेदार हैं क्यों एक महिला दूसरी महिला पर अत्याचार करती है या अत्याचार होते हुए देखती है, क्यों नहीं हम एक दूसरे का सहारा बनती. वजह साफ़ है - हमारी आवाज़ में ही वो दम, वो दहाड़, वो चिंगारी नहीं है जो एक क्रांति का रूप धारण कर सके क्योंकि हमारी कानून व्यवस्था ही खोखली है. इस पुरुष-प्रधान समाज में महिलाओं को सम्मान मिलना तो दूर की बात है उन्हें न्याय ही नहीं मिलता. क्यों नहीं ऐसे व्यक्तियों के लिए कड़े कानून बनाये जाते हैं, क्यों नहीं उन्हें ऐसी सजा दी जाती है जो बाकी लोगों के लिए दहशत का काम करे. क्यों उन्हें जमानत पर छोड़ा जाता है, एक बार ही ऐसा किया जाए कि उन पर थोडा सा तेजाब छिड़क दिया जाए जो कम से कम उन्हें एहसास तो दिलाये कि झुलसना क्या होता है.

सोनाली का कहना बिलकुल तर्कसंगत है कि हम चाहे कितना ही आर्थिक विकास कर लें पर नारी का सम्मान ही नहीं कर पाते, उसे सुरक्षा नहीं दे सकते तो बाकी का विकास हमारे लिए कोई मायने नहीं रखता.  आज ज़रुरत है व्यवस्था को बदलने की, सोच को बदलने की अगर स्वस्थ समाज चाहिए तो सोच को भी स्वस्थ बनाना होगा.  और अंत में ..........

मंजिल  तक पहुँचने के लिए ख़ुद पाँव बढ़ाना  होगा।
रोशनी पाने के लिए मुझे ख़ुद को जलाना  होगा
शक्तिपुंज  हूँ मैं एक नए समाज का निर्माण करना होगा
यह मत भूलना  तुम मैं नारी  हूँ
न हारी  हूँ मैं कभी---न हारूंगी कभी

Sunday, February 24, 2013

नशा


था एक मासूम खिलंदड़ा बचपन
डैनो में दम था मुक्त गगन में विचरता था
कौतुक आँखों से दुनिया की सैर करता था
नशे की इक बदली सी आयी
तन, मन धन सब पर छाई
न डैनो में दम रहा न मन पर बस रहा
मैं तो बस नशे का एक गुलाम बन कर रह गया

नशा मुक्ति केंद्र में जाकर अनायास मेरे मन में ये विचार आ गए मासूम बच्चों को इस लत का शिकार बनते देखा. लगा क्या है इनका जीवन, क्यों ये ऐसी लत का शिकार हुए हैं जो इन्हें चोरी, डाका, हत्या जैसे कुकर्मो को करने के लिए प्रेरित करती है. बचपन तो मासूम होता है, इन सबसे अनजान होता रहता है पर सौदागरों को इन सबसे कुछ लेना देना नहीं होता उन्हें सिर्फ अपनी तिजोरिओं को भरना होता है वो चाहे किसी भी तरीके से भरी जाए किसी का बचपन छीनता है किसी की जवानी घुलती है, किसी का बचपन छीनता है, किसी का बुढ़ापा ख़राब होता है इन सबसे उन्हें कुछ लेना देना नहीं होता. जिन्हें नशे की लत लग जाती है उन्हें हर समय अपनी नशे की खुराक चाहिए, न मिले तो वो इस नशे के इतने गुलाम बन जाते हैं कि इसके लिए वे चोरी और हत्या करने में भी पीछे नहीं हटते. क्योंकि तब इन्हें सिर्फ एक ही चीज़ चाहिए, तब अपने मन पर भी इनका कोई बस नहीं रहता, शरीर को भी इसकी इतनी आदत हो जाती है कि थोड़ी देर होने से ही शरीर अकड़ने लगता है, जबान ऐंठने लगती है, आँखों में खुमार सा छाने लगता है यानि कि मन और शरीर को इस नशे के अतिरिक्त कुछ नहीं सूझता

पर इन सबसे बचने का उपाय क्या है? जब नशे का उत्पादन ही न हो तो हमें इन नशा मुक्ति केंद्र को खोलने की आवयश्कता क्यों होती ? सरकार अपने कर्तव्यो की पूर्ती सिर्फ एक वैधानिक चेतावनी दे कर ही लेती है कि १८ वर्ष से कम उम्र के बच्चो को बीडी, सिगरेट बेचना कानूनन जुर्म है. सरकार इन सबका उत्पादन क्यों नहीं बंद करती, क्यों अफीम, चरस, तम्बाकू का उत्पादन भारत में सबसे ज्यादा होता है क्यों नहीं इन शराब बिक्री केन्द्रों को बंद किया जाता है. क्यों ऐसी कंपनियो को लाइसेंस दिए जाते हैं जिन्हें इन्ही शराब कि बिक्री में करोडो का फायदा होता है
वजह साफ़ है कि सरकार को सबसे ज्यादा फायदा इन्ही स्रोतों से प्राप्त होती है. क्यों नहीं कानून को इतना कड़ा बना दिया जाता है की जो व्यक्ति इस नशे को बेचता नज़र आये/पकड़ा जाए उसे इतनी सख्त सजा दी जाए कि बाकी लोग इससे इक सबक ले .
लेकिन सरकार को ही दोष देने से काम नहीं चलेगा. परिवार की भी अपनी इक भूमिका होनी चाहिए बच्चो को इतना प्यार, अपनत्व, ममत्व परिवार से मिले कि वो खुद ही इस लत से दूर रहे. उसे इससे होते वाली हानियों के बारे में इतनी जानकारी दी जाए कि वो स्वंय ही समझ जाए कि उसका भविष्य इस नशे में अँधेरे के गर्त में ही जा सकता है. परिवार का मुखिया यदि इन सब चीज़ों को खुद ही उपयोग करता है, खुद ही नशे का गुलाम है तो बच्चो को क्या सीख देगा

Wednesday, February 13, 2013

जीवन

                                                                आज की जिंदगी


                 जीवन क्या है ?  इसका उत्तर तो शायद ही किसी के पास हो.  हर व्यक्ति की परिभाषा अलग होगी.  कुछ दिन पहले कुछ अच्छा हुआ तो जीवन बहुत सुंदर है - स्वर्ग के समान और कुछ बुरा हुआ तो भई कांटो भरा जीवन है.  खोया कुछ ज्यादा, पाया कुछ कम.

                याद आता है बचपन का ज़माना. एकदम खुशनुमा, मस्ती से भरपूर , न कोई चिंता न कोई निराशा. बस अलमस्त सा जीवन. पेड़ो पर चढ़ना, लुक छिपी खेलना, रस्सी कूदना, साइकिल चलाना, दोस्तों के साथ मस्ती, लड़ाई झगडा, रूठना मनाना सब चलता था और लगता था कि यही है जीवन. बड़े हुए थोड़ी चिंता बड़ी - पढाई की.  पर ऐसा टेंशन भी नहीं था कि क्या करेंगे.  हमारे समय में मुझे लगता था कि आजकल के समान कम्पटीशन नहीं था. अच्छे नंबर लाना है बस यही चाह होती थी और उतनी मेहनत तो कर ही लेते थे.

              आजकल के बच्चे जहाँ दो-चार साल के हुए कि नहीं माँ-बाप को ज्यादा फ़िक्र हो जाती है कि अब बच्चे को कौन से प्ले स्कूल में डाला जाये.  और फिर शुरू होता है एक दुस्वप्न बच्चे के लिए.  सुबह जल्दी उठना जबरदस्ती कुछ पेट में डालना, मूड है या नहीं इससे माँ-बाप को कुछ मतलब नहीं, स्कूल वैन में जाना आदि आदि.  यानि टार्चर ही टार्चर. उस पर तुर्रा यह कि कुछ कम प्रगति दिखाई दी तो माँ-बाप कि तो शरम के मारे नाक ही कट गयी. 

             असल में mahtavakaanshaa ने ही आज की ज़िन्दगी को इतना बोझिल कर दिया है.  कम समय में ज्यादा पा लेना, संतुष्टि (शांति) का अभाव - ये है आज के समाज की देन.आजकल हर व्यक्ति सब कुछ एकदम जल्दी जल्दी पा लेना चाहता है.  घर है पर अब बड़ा चाहिए.  गाडी है पर अब बड़ी लेनी है, कपडे, घड़ियाँ, जूते सब ब्रांडेड ही चाहिए.  होड़, होड़ और बस होड़. सप्ताहांत तो बाहर ही मनाना है.  पिक्चर, मॉल, लंच बाहर तो डिनर फाइव स्टार में.  दो दिन तो भई रिलैक्स करना है और यही है रिलैक्स की परिभाषा - जस्ट चिल्ल आउट.  सब कुछ है पर 'कुछ' भी नहीं.  यह 'कुछ' क्या है - मन की शांति है जो आज की पीढ़ी के पास है ही नहीं.  भागदौड़ भरी ज़िन्दगी. सुबह सुबह ऑफिस के लिए निकल जाना है.  जाने का टाइम फिक्स है पर आने का तो बिलकुल भी नहीं है.  १० भी बज सकते है, ११ भी और १२ भी.  थकान इतनी ज्यादा कि दो बातें करने का भी मूड नहीं होता, बच्चे या तो सो चुके होते हैं या फिर टी.वी/कंप्यूटर में आँखें गडाये हुए होते हैं.  थकान उतारने के लिए  १-२ पेग भी जरूरी हैं तो साथ भी चाहिए तो फिर आजकल की पत्निया किस से कम हैं भई.  कंधे से कंधे मिलकर चल रही हैं, आधुनिक समाज की हैं तो इन बातों में क्यों पीछे रहें.

                   मुझे याद है, मुझे क्या हमारी पीढ़ी के सभी लोगों को याद होगा कि जब हम छोटे थे तो हमारी दुनिया बस माँ के आगे-पीछे ही घूमा करती थी. स्कूल के आये तो माँ दिखनी चाहिए, रोना है तो माँ का आँचल चाहिए होता था, हँसना होता था तो चाहते थे  कि माँ साथ में खिलखिलाए.  रूठना, मचलना, जिद पकड़ना, रोना, हँसना, खाना सब के लिए बस माँ.  और माँ  की दुनिया उसके बच्चे.  बच्चों को अच्छे संस्कार माँ ही डालती थी.  कोई आया आपके घर और आपने नमस्ते नहीं की तो -"क्यों नहीं किया विश ये बातें भी अब तुम्हे समझनी पड़ेंगी" मतलब नाक ही कट गयी.  पानी का गिलास मेहमानों के सामने रखा तो बाद में आ गयी शामत - "गिलास धोया क्यों नहीं था" ये भी समझाना पड़ेगा" और हम आज तक समझे हुए हैं.
अब आज की मॉडर्न मम्मी को तो खुद ही खाना बनाना , घर को घर नहीं बनाना आता तो बाकी की उम्मीद तो छोड़ ही दीजिये.
 

Wednesday, January 02, 2013

नववर्ष

   नववर्ष की शुभकामनाओ के साथ ....................



नववर्ष
 
खुशियों के ये पल आते हैं हर साल
बीत जाते हैं मौसम बीत जाते हैं साल
कभी छाते हैं गम के बादल तो कभी आते हैं खुशियों का सागर
पर मन तो आशा निराशा में झूल रहा
कल क्या होगा बस यही सोच रहा
पर कुछ भूल गए हम
ख़ुशी है तो गम भी
दिन है तो रात भी, हर रात के बाद सवेरा भी
आज सवेरा है नववर्ष का
कुछ हैं नयी उम्मीदे, कुछ हैं नए संकल्प
अभी अभी जन्म लिया इक नयी कोंपल कोंपल ने
खिलने दो उसे पाने दो विस्तार उसे
असीमित है आकाश - फैलाने दो पंख उसे
यही कामना है सब की की कि हर सुबह नवप्रभात हो
चारो ओर आलोक ही आलोक हो
मंगलमय, उल्लासमय, स्वस्थ्मेय हो आपका जीवन
यही है नववर्ष का सार
यही है नववर्ष का आधार