Wednesday, June 20, 2012

Bistar



यह कविता मैंने अपने बेटे की याद में लिखी है जब वे हॉस्पिटल में थे तो मैं रोज़ वहां बैठ कर लोगों की मानसिक व्यथा को महसूस करती थी हर चेहरे पर एक दुःख का भाव होता था जो कहीं अन्दर से मुझे कचोटता था........ईश्वर हम सबको शांति दे


बिस्तर की आत्मकथा

हाँ जी हाँ मैं हूँ हस्पताल का बिस्तर
देखता हूँ रोज़ विधि की विडम्बना
कितनी आहें, कितनी कराहें
पर विवश, अचल पड़ा सब देखता हूँ
मेरे एक तरफ कुछ साँसों ने अभी जनम लिया है
तो दूसरी तरफ कुछ सांसों ने अभी साथ छोड़ा है
रूदन दोनों में ही है पर एक में ख़ुशी का
तो दूसरे में विछोह का .
दुआ में हाथ सभी के उठते हैं
बस मुझ पर आने वाले शरीर बदलते रहते हैं
कभी सुनता हूँ किसी विधवा माँ की सिसकी
तो कभी सुनता हूँ किसी मासूम का क्रंदन
पर विवश अचल पड़ा सब देखता हूँ
सोचता हूँ जीवन इतना संघर्षमय क्यों हैं?
जीवन के राहें इतनी टेढ़ी मेढ़ी क्यों हैं?
पर फिर सोचता हूँ यही तो जीवन है
विरोधाभासो से भरा
फूल हैं तो कांटे भी हैं, ख़ुशी है तो गम भी हैं
दिन है तो रात भी है, हर रात के बाद सवेरा भी
क्यों जीवन से निराश होना, साँसों ने तो बस है आना जाना
तो फिर मैं क्यों अशांत हो जाता हूँ.
सोचता हूँ, क्यों भूल जाता है इंसान...
पहली सांस के साथ ही आखिरी सांस का जनम होता है
हर सांस के साथ mritiu बाहर आती है
हर सांस के साथ mritiu भीतर जाती है
किस मोड़ पर, किस दर पर सांस साथ छोड़ दे कुछ नहीं पता
तो फिर.............क्यों इतनी आपाधापी है
जीवन तो अनवरत चलना है
बस इतना याद रखना है.............
संघर्ष ही जीवन है, जीवन ही संघर्ष है