Tuesday, September 01, 2009

मेरी ज़िन्दगी कुहासे में लिपटी जैसे
जिसके पार मैं शायद कुछ देखने का यतन कर रही हूँ
कुछ अस्पष्ट सी आकृतियाँ या शायद किसी
शख्स की शक्सियत मेरे जेहन में धुंएँ के समान उड़ रही है
कुहासे के उस पार मैं कुछ देख रही हूँ
शायद अपना बीता हुआ कल- नही उसकी चुभन तो मैं भूल चुकी हूँ
या शायद अपना आज- नही नही वो तो किसी अनदेखे व्यक्तित्व में कल को ढूँढ रहा है
तो फिर शायद अपना भविष्य
जो उस कुहासे की चादर के पीछे किसी बच्चे की तरह झांक रहा है
ये क्या है......?
देखो कोहरा छंट रहा है और कोई सूरत अख्तियार कर रहा है
अरे....ये तो मेरे ही जिस्म का टुकडा है
जिसे मैंने ही जनम दिया है
इसी अनदेखे व्यक्तित्व में तो मैं अपना
कल आज और कल ढूँढ रही थी
देखो देखो सूरज की पहली किरण मेरे इस नन्हे अस्तित्व पर पड़ी
तुमने देखा कुछ....?
हाँ! हम दोनों ही दूर शितिज की तरफ़ बड़े जा रहे हैं
अपने अनदेखे अनजाने आने वाले
कल को सूरज की इस स्वर्णिम किरण की भांति
अपने आज को आलोकित करने .

1 comment:

જીવન ના િવિવધ રંગો said...

Waah Shilpa Ji Aapki Rachna Badhkar Man Bhav Vibhor Ho Gaya Wakai me Aap Ki Pratibha Kaabil-E-Taarif Hai