मैंने एक नए नीड़ का निर्माण किया है
इसमे आशा के साथ निराशा को,
सुख के साथ दुखों को , फूलों के साथ काँटों को सजाया है
आश्चर्य हो रहा हैं न ....होना ही चाहिये
कितना विरोधाभास है सबमे
भला ऐसा भी कोई करता है? पर मैंने किया है
एक बात तो सभी भूल गए हैं
निराशा से ही तो आशा जनम लेती है
दुखों के साथ ही तो हम सुखों को याद करते हैं
और फिर कभी तुमने कल्पना की है
एक गुलाब की काँटों के बिना
ज़िन्दगी को जीना है तो सब को अपनाना सीखो
काँटों के बीच रहकर मुस्कराना सीखो
ज़िन्दगी में सुख दुःख तो आयेंगे ही पर
हर एक पल को जीना सीखो

1 comment:
Waah Shilpa Ji Kanto Ke Bich Rehkar bhi Jis Tarah Phool Khilkhilata Hai Usi Tarah Insaan Ko Sukh Ho Chahe Dukh Ho Use Saman Roop Se Sweekar Karna Chahiye
Bahot Utkrisht Rachna [:)]
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