Thursday, September 17, 2009

यह कविता मेरी एक दोस्त ने मुझे ऑरकुट पर भेजी है, अवनि जिनका नाम है, कविता उन्ही की लिखी है जो उन्होंने मुझे भेजी थी, मैं इस कविता को हमेशा अपने पास रखना चाहती हूँ इसिलिएये अपने ब्लॉग में इसे लिख रही हूँ ..........
मेरी सहेली एक नटखट, मेरी सहेली है
थोडी सी चुलबुली थोडी सी नटखट है
उनकी बातें मुझको भाती मीठी मीठी प्यारी प्यारी
अंदाज़ उनका निराला निराला sबातें करती पट पट पट
मस्ती से भरी उनकी बातें महका जाती मेरे मन को
बातों से उनकी लगता जैसे फूल झर रहे हो झर झर झर
ऐसा रूप उनका सुहाना अवनि पर जैसे फूल खिल गए हो हजारों
वो आती जब मेरे स्क्रैप पर
मैं घंटो निहारती उनको टकटकटकटक
khoobsurati में क्या कहना उनका
जैसे fursat में gada हो shilpkar ने shilpa को
घर से जब वो निकलती to commn। wale kehte हैं
रुक रुक रुक रुक

Tuesday, September 01, 2009

मेरी ज़िन्दगी कुहासे में लिपटी जैसे
जिसके पार मैं शायद कुछ देखने का यतन कर रही हूँ
कुछ अस्पष्ट सी आकृतियाँ या शायद किसी
शख्स की शक्सियत मेरे जेहन में धुंएँ के समान उड़ रही है
कुहासे के उस पार मैं कुछ देख रही हूँ
शायद अपना बीता हुआ कल- नही उसकी चुभन तो मैं भूल चुकी हूँ
या शायद अपना आज- नही नही वो तो किसी अनदेखे व्यक्तित्व में कल को ढूँढ रहा है
तो फिर शायद अपना भविष्य
जो उस कुहासे की चादर के पीछे किसी बच्चे की तरह झांक रहा है
ये क्या है......?
देखो कोहरा छंट रहा है और कोई सूरत अख्तियार कर रहा है
अरे....ये तो मेरे ही जिस्म का टुकडा है
जिसे मैंने ही जनम दिया है
इसी अनदेखे व्यक्तित्व में तो मैं अपना
कल आज और कल ढूँढ रही थी
देखो देखो सूरज की पहली किरण मेरे इस नन्हे अस्तित्व पर पड़ी
तुमने देखा कुछ....?
हाँ! हम दोनों ही दूर शितिज की तरफ़ बड़े जा रहे हैं
अपने अनदेखे अनजाने आने वाले
कल को सूरज की इस स्वर्णिम किरण की भांति
अपने आज को आलोकित करने .

नीड़ का निर्माण

मैंने एक नए नीड़ का निर्माण किया है
मध्य में समंजित करेंइसमे आशा के साथ निराशा को,

सुख के साथ दुखों को , फूलों के साथ काँटों को सजाया है

आश्चर्य हो रहा हैं न ....होना ही चाहिये

कितना विरोधाभास है सबमे

भला ऐसा भी कोई करता है? पर मैंने किया है

एक बात तो सभी भूल गए हैं

निराशा से ही तो आशा जनम लेती है

दुखों के साथ ही तो हम सुखों को याद करते हैं

और फिर कभी तुमने कल्पना की है

एक गुलाब की काँटों के बिना

ज़िन्दगी को जीना है तो सब को अपनाना सीखो

काँटों के बीच रहकर मुस्कराना सीखो

ज़िन्दगी में सुख दुःख तो आयेंगे ही पर

हर एक पल को जीना सीखो


Thursday, August 27, 2009

Yaaden

आने वाला कल एक सपना है
गुजरा हुआ कल बस अपना है
हम गुजरे हुए कल में जीते हैं
और इन यादों के संग जीते हैं
यादें जो मीठी हैं
यादें जो कड़वी हैं
मन के किसी कोने में छुपी हैं यादें
बचपन की पहचान है यादें
जवानी का खुमार हैं यादें
बुदापे के कसक हैं यादें
इन यादों को सहेजे रखना
जब भी कभी झांकोगे इन यादों के झरोखों से
सिमट जायेगी एक खूबसूरत दुनिया इन आंखों में

कल