निर्माण एक नए समाज का
सागर सी गहरी हूँ, धरती सी विशाल हूँ।
दूब सी कोमल हूँ, चट्टान सी कठोर हूँ
कभी jawarbhatte की ऊंची उठती तरंग हूँ तो
कभी किसी jheel की सतह सी शांत हूँ।
कभी तपते आग का गोला हूँ तो कभी चंदरमा की शीतल चांदनी हूँ
कौन हूँ मैं- नही पहचाना मुझे
इस संसार का रचियता की सुन्दरतम रचना हूँ मैं
अरे मैं वामा हूँ, स्त्री हूँ, जननी हूँ
तीन बार मैं जनम लेती हूँ मैं
पहले माँ के गर्भ से बेटी के रूप में
फिर विवाह की वेदी पर पत्नी के रूप में
और फिर एक नयी रचना को जनम देते समय माँ के रूप में
par हाय रे vidambana Ram कृष्ण की जननी होते हुए भी
मेरे prarabdh में सिर्फ़ siskiyaan हैं कितनी tiraskrit हूँ मैं।
ये समाज और ये समाज के thekedar-क्यों मेरी sansoon पर pehra lagate हैं
बेटी रूप में pehchante ही गर्भ में मेरी हत्या क्यों करते हैं
कभी dahej की वेदी पर मेरी bali क्यों chadate हैं
माँ हूँ न सबकी फिर क्यों vridhawastha में
vridhashram की sidioon में chode चले आते हैं।
इतिहास को मैंने जनम दिया है, vartaman में भी मैं ही हूँ
bhavishay भी मेरे गर्भ में है तो फिर मैं क्यों shaktiheen हूँ।
पर नही अब और नही न jhoookoongi न tootoongi।
janti हूँ राह में biche हैं kaante, manzil तक pahunchna नही है assan
manzil तक पहुँचने के लिए ख़ुद पाँव badana होगा।
roshni पाने के लिए मुझे ख़ुद को jalana होगा
shaktipunj हूँ मैं एक नए समाज का निर्माण करना होगा
karoongi--karoonti.....मैं एक ऐसे नए समाज का निर्माण
jahan मेरी पूजा होगी, jahan विश्वास होगा jahan प्यार होगा
यह मत bhoolna तुम मैं naari हूँ
न haari हूँ मैं कभी---न haroongi कभी.