तेरे शहर मे आस्मान को छूती इमारते है
चमचमाती कारें हैं, सरसराती सड़कें हैं
तेरा शहर बड़ा ही सजीला है, बड़ा रंगीला है
फिर भी मेरा दिल यहाँ नही लगता
क्योंकि तेरा शहर इंसान को निगल गया है।
इंसानियत यहाँ दर दर भटक रही है
पर उसे तेरे शहर मे पनाह नही मिलती
सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं
इसिस्लिएय मेरा दिल यहाँ नही लगता।
तेरे शहर मे सजे सवारे ड्राइंग रूम हैं, आरामदायक बेडरूम हैं
पर उसमे रहने वालों को पल भर भी सकूं नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
दम तोड़ते बाप की खावीश है की kucch पल बेटा मेरा हाथ थामकर बैठे
वृधाश्रम के बिस्तर पर लेती माँ की खावैश है के बच्चों को आँचल मे चुप कर रो ले,
पर बच्चों के पास इन बेमानी बातों के लीये वक्त नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
याद आता है मुझे अपना छोटा सा शहर
जहाँ धूल भरी कच्ची सड़कें हैं, छोटे छोटे घर हैं पर बड़े बड़े आँगन हैं
आँगन मे गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठी माँ नज़र आती है
जो आज भी स्वेटर न पहनने पर बाबूजी को दंत लगाती है
ज़रा सी हरारत होने पर माँ मेरे सिरहाने बैठ रात आंखों मे काटती है
काश तेरा शहर भीऐसा हो जाए
जहाँ इंसान के हसियत की नही इंसानी रिश्तों की कदर हो
आंखों मे प्यार का समुंदर हो, सीने मे धड़कता हुआ दिल हो
फिर तेरे शहर मे कोई फर्क नही रह जाएगा
फिर मेरा दिल तेरे शहर मे लग जाएगा.
