Thursday, May 08, 2008

नवजीवन

ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे

पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी

वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक

दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी

शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था

के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया

दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,

हवा ने पूरी ताकत लगाई

पर दिए को बुझा न पाई

मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर

विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी

मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ

जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा

मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी

दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी

सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था

और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी

नई डगर पर..............

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