नवजीवन
ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे
पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी
वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक
दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी
शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था
के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया
दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,
हवा ने पूरी ताकत लगाई
पर दिए को बुझा न पाई
मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर
विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी
मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ
जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा
मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी
दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी
सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था
और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी
नई डगर पर..............

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