यह कविता मैंने अपनी बिटिया के लिए लिखी जब उन्हें अपने विधालय में पर्यावरण पर कुछ बोलना था।
एक पथिक दूर से आता दिखता है
आंखो में तलाश, होंटों पे प्यास
शीतल तरुवर की छाया में दूर तक नज़र दौड़ता है।
चारों ओर ठूंट ही ठूंट ही सूखी ज़मीन पाता है ।
थके क़दमों से अपनी मंजिल की ओर बढता चला जाता है ।
देखा--- यही है भाविशेय हमारे देश का
यूँही वृक्ष काटोगे धरती को बंज़र बनाओगे
तो हरियाली कहाँ से पाओगे
भूल गए हैं हम एक ही वृक्ष से तो और वृक्ष बनते हैं
फल, फूल, लकड़ी सब कुछ ही तो पाते हैं
फिर भी हम इनको काटे चले जाते हैं।
बस इतना याद रखना है
एक और वृक्ष लगाना हैं हरियाली को बचाना हैं
वो चंदन की सुगंध, वो अम्बियो के महक तभी तो पाओगे
जब एक वृक्ष लगाओगे
यही एक नारा याद रखना हैं
एक और वृक्ष लगाना है
देश को बचाना है.
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