Friday, May 16, 2008

यह कविता मैंने अपनी एक कलिग की विदाई पार्टी में सुनायी थी । ११ अप्रिल को - इस दिन मेरा जन्मदिन भी होता है इसीलिए मुझे यह दिन हमेशा याद रहेगा।

बीते लम्हे कुछ यूं याद आ रहे हैं
गुजरे तीन दशक आंखों मी समाये जा रहें हैं।
इन गलियारों में खड़े होकर सखियों संग बतियाना
कैंटीन मी बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ खिलखिलाना
गर्मियों के दुपहरी में कमरे में बैठकर सुस्ताना
सर्दियों की कुंकुनी धुप में बैठकर मूंगफली खाना
सब कुछ याद आ रहे हैं
गुजरे तीन दशक आंखों में समाये जा रहे हैं।
पल पल करते कितने ही पल बीत गए
कल कल करते ६० वर्ष बीत गए
कभी किसी से कुछ कहा तोः किसी से सुना भी
किसी को कुछ दिया तोः बहुत कुछ पाया भी
वो प्यार, वो सम्मान , वो अपनापन सब याद आ रहे हैं।
गुजरे तीन दशक आंखों में समाये जा रहे हैं।
क्या कहे आपसे कुछ कहने के काबिल नही
आपसे बस इतना कहना चाहते हैं के
ख़ुद को ख़ुद से कैसे भुला पाओगे
अपनी पहचान कैसे भुला पाओगे
अंधेरों में जब भी जाओगे तुम
अपने साथ हमे पाओगे तुम।

Wednesday, May 14, 2008

यह कविता मैंने अपनी बिटिया के लिए लिखी जब उन्हें अपने विधालय में पर्यावरण पर कुछ बोलना था।

एक पथिक दूर से आता दिखता है
आंखो में तलाश, होंटों पे प्यास
शीतल तरुवर की छाया में दूर तक नज़र दौड़ता है।
चारों ओर ठूंट ही ठूंट ही सूखी ज़मीन पाता है ।
थके क़दमों से अपनी मंजिल की ओर बढता चला जाता है ।
देखा--- यही है भाविशेय हमारे देश का
यूँही वृक्ष काटोगे धरती को बंज़र बनाओगे
तो हरियाली कहाँ से पाओगे
भूल गए हैं हम एक ही वृक्ष से तो और वृक्ष बनते हैं
फल, फूल, लकड़ी सब कुछ ही तो पाते हैं
फिर भी हम इनको काटे चले जाते हैं।
बस इतना याद रखना है
एक और वृक्ष लगाना हैं हरियाली को बचाना हैं
वो चंदन की सुगंध, वो अम्बियो के महक तभी तो पाओगे
जब एक वृक्ष लगाओगे
यही एक नारा याद रखना हैं
एक और वृक्ष लगाना है
देश को बचाना है.

Friday, May 09, 2008

कब तक छलते रहोगे
कब तक तुम मुझे छलते रहोगे
बोलो कब तक तुम मुझे छलते रहोगे
हर युग में तुम मुझे छलते रहे।
सीता बन अग्नि परीक्षा दी मैंने
तुम्हे मर्यादा पुरषोत्तम बनाया किसने ?
बोलो मर्यादा पुरषोत्तम बनाया किसने?
गोपी बना विरह अग्नि में जलाया किसने?
राधा बना बंसी की धुन पर नचाया मुझे
बोलो योगिराज कृष्ण किसने बनाया तुम्हे?
नन्हें राहुल को सीने से लगा बहलाया मैंने
रो रो कर एकाकी जीवन बिताया मैंने
बोलो गौतम बुध किसने बनाया तुम्हे?
तुम्हारे द्वारा बार बार छले जाने पर भी
मैं हताश नही हूँ, मैं निराश नही हूँ।
क्योंकि मैं जानती हूँ की हर युग को एक मर्यदावादी राम चैएये
हर युग को योगिराज कृष्ण चिएये
इसीलिए हर युग मी तुम्हारे द्वारा छले जाना मुझे अंगीकार है
बोलो तुम कब तक मुझे छलते रहोगे?
बोलो कब तक तुम मुझे छलते रहोगे?

Thursday, May 08, 2008

नवजीवन

ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे

पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी

वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक

दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी

शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था

के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया

दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,

हवा ने पूरी ताकत लगाई

पर दिए को बुझा न पाई

मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर

विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी

मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ

जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा

मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी

दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी

सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था

और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी

नई डगर पर..............