कुछ कहा तुमने मुझे ? एक इंसान कहा ?
क्या मैं इंसान हूँ ?
ठीक है, मैं हाध मांस का बना हूँ
sआवासों मे जीता हूँ, पर क्या मैं फिर भी इंसान हूँ।
नही॥ मैं इंसान नही एक हैवान हूँ शायद
- मैंने खड़ी की दीवार धरम की
मैंने ही गया राग जाति ka
भाषा को बनाया एक हथियार
पानी को भी बांटा मैंने हर बार
-नही देखी मैंने किसी मासूम के हँसी
छीनी मैंने अधरू से किसी नव्योवना की हँसी
नही सुनी मैंने किसी विधवा माँ kee हँसी
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ
कल जालिअवालन बाग़ आज अक्षरधाम
कल कोई टूटी मस्जिद
मेरी ही टू देन है
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
- ये उजधता चमन वो मसली कालेi
वो bइलाखता बचपन इसका रचियता मैं ही टीoh हूँ
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भुला दिया मैंने ये देश है गौतम गाँधी का
जहाँ बहती थी कभी दूध के नदियाँ
वहाँ बहाई हैं मैंने खून के नदियां
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भूल गया मैं - माली चमन ujadta नही
फूल सुगंध लेता नही, nadi neer peeti नही
- नही अब और नही
बस इतना याद रखना हैं मुझे
मृत्यु से नही darna है मुझे
जीवन थो एक युद्ध हैं इसे लड़ना हैं muझे
नही मानव बनना है मुझे
एक नया इतिहास रचना है मुझे
Thursday, March 13, 2008
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
0 comments:
Post a Comment