Sunday, March 30, 2008

मेरा अक्स (पहचान)

मेरी ज़िन्दगी कुहासे में लिपटी जैसे
जिसके पार मैं शायद कुछ देखने का यतन कर रही हूँ
कुछ अस्पष्ट सी आकृतियाँ या शायद किसी
शख्स की शक्सियत मेरे जेहन में धुंएँ के समान उड़ रही है
कुहासे के उस पार मैं कुछ देख रही हूँ
शायद अपना बीता हुआ कल- नही उसकी चुभन तो मैं भूल चुकी हूँ
या शायद अपना आज- नही नही वो तो किसी अनदेखे व्यक्तित्व में कल को ढूँढ रहा है
तो फिर शायद अपना भविष्य
जो उस कुहासे की चादर के पीछे किसी बच्चे की तरह झांक रहा है
ये क्या है......?
देखो कोहरा छंट रहा है और कोई सूरत अख्तियार कर रहा है
अरे....ये तो मेरे ही जिस्म का टुकडा है
जिसे मैंने ही जनम दिया है
इसी अनदेखे व्यक्तित्व में तो मैं अपना
कल आज और कल ढूँढ रही थी
देखो देखो सूरज की पहली किरण मेरे इस नन्हे अस्तित्व पर पड़ी
तुमने देखा कुछ....?
हाँ! हम दोनों ही दूर शितिज की तरफ़ बड़े जा रहे हैं
अपने अनदेखे अनजाने आने वाले
कल को सूरज की इस स्वर्णिम किरण की भांति
अपने आज को आलोकित करने .


Thursday, March 13, 2008

paribasha insaan ke

कुछ कहा तुमने मुझे ? एक इंसान कहा ?
क्या मैं इंसान हूँ ?
ठीक है, मैं हाध मांस का बना हूँ
sआवासों मे जीता हूँ, पर क्या मैं फिर भी इंसान हूँ।
नही॥ मैं इंसान नही एक हैवान हूँ शायद
- मैंने खड़ी की दीवार धरम की
मैंने ही गया राग जाति ka
भाषा को बनाया एक हथियार
पानी को भी बांटा मैंने हर बार

-नही देखी मैंने किसी मासूम के हँसी
छीनी मैंने अधरू से किसी नव्योवना की हँसी
नही सुनी मैंने किसी विधवा माँ kee हँसी
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ
कल जालिअवालन बाग़ आज अक्षरधाम
कल कोई टूटी मस्जिद
मेरी ही टू देन है
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
- ये उजधता चमन वो मसली कालेi
वो bइलाखता बचपन इसका रचियता मैं ही टीoh हूँ
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भुला दिया मैंने ये देश है गौतम गाँधी का
जहाँ बहती थी कभी दूध के नदियाँ
वहाँ बहाई हैं मैंने खून के नदियां
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भूल गया मैं - माली चमन ujadta नही
फूल सुगंध लेता नही, nadi neer peeti नही
- नही अब और नही
बस इतना याद रखना हैं मुझे
मृत्यु से नही darna है मुझे
जीवन थो एक युद्ध हैं इसे लड़ना हैं muझे
नही मानव बनना है मुझे
एक नया इतिहास रचना है मुझे