Tuesday, December 30, 2008
निर्माण एक नए समाज का
Friday, May 16, 2008
Wednesday, May 14, 2008
Friday, May 09, 2008
Thursday, May 08, 2008
नवजीवन
ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे
पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी
वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक
दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी
शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था
के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया
दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,
हवा ने पूरी ताकत लगाई
पर दिए को बुझा न पाई
मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर
विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी
मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ
जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा
मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी
दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी
सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था
और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी
नई डगर पर..............
Sunday, April 20, 2008
तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता
तेरे शहर मे आस्मान को छूती इमारते है
चमचमाती कारें हैं, सरसराती सड़कें हैं
तेरा शहर बड़ा ही सजीला है, बड़ा रंगीला है
फिर भी मेरा दिल यहाँ नही लगता
क्योंकि तेरा शहर इंसान को निगल गया है।
इंसानियत यहाँ दर दर भटक रही है
पर उसे तेरे शहर मे पनाह नही मिलती
सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं
इसिस्लिएय मेरा दिल यहाँ नही लगता।
तेरे शहर मे सजे सवारे ड्राइंग रूम हैं, आरामदायक बेडरूम हैं
पर उसमे रहने वालों को पल भर भी सकूं नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
दम तोड़ते बाप की खावीश है की kucch पल बेटा मेरा हाथ थामकर बैठे
वृधाश्रम के बिस्तर पर लेती माँ की खावैश है के बच्चों को आँचल मे चुप कर रो ले,
पर बच्चों के पास इन बेमानी बातों के लीये वक्त नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
याद आता है मुझे अपना छोटा सा शहर
जहाँ धूल भरी कच्ची सड़कें हैं, छोटे छोटे घर हैं पर बड़े बड़े आँगन हैं
आँगन मे गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठी माँ नज़र आती है
जो आज भी स्वेटर न पहनने पर बाबूजी को दंत लगाती है
ज़रा सी हरारत होने पर माँ मेरे सिरहाने बैठ रात आंखों मे काटती है
काश तेरा शहर भीऐसा हो जाए
जहाँ इंसान के हसियत की नही इंसानी रिश्तों की कदर हो
आंखों मे प्यार का समुंदर हो, सीने मे धड़कता हुआ दिल हो
फिर तेरे शहर मे कोई फर्क नही रह जाएगा
फिर मेरा दिल तेरे शहर मे लग जाएगा.
Sunday, March 30, 2008
मेरा अक्स (पहचान)
Thursday, March 13, 2008
paribasha insaan ke
क्या मैं इंसान हूँ ?
ठीक है, मैं हाध मांस का बना हूँ
sआवासों मे जीता हूँ, पर क्या मैं फिर भी इंसान हूँ।
नही॥ मैं इंसान नही एक हैवान हूँ शायद
- मैंने खड़ी की दीवार धरम की
मैंने ही गया राग जाति ka
भाषा को बनाया एक हथियार
पानी को भी बांटा मैंने हर बार
-नही देखी मैंने किसी मासूम के हँसी
छीनी मैंने अधरू से किसी नव्योवना की हँसी
नही सुनी मैंने किसी विधवा माँ kee हँसी
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ
कल जालिअवालन बाग़ आज अक्षरधाम
कल कोई टूटी मस्जिद
मेरी ही टू देन है
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
- ये उजधता चमन वो मसली कालेi
वो bइलाखता बचपन इसका रचियता मैं ही टीoh हूँ
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भुला दिया मैंने ये देश है गौतम गाँधी का
जहाँ बहती थी कभी दूध के नदियाँ
वहाँ बहाई हैं मैंने खून के नदियां
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भूल गया मैं - माली चमन ujadta नही
फूल सुगंध लेता नही, nadi neer peeti नही
- नही अब और नही
बस इतना याद रखना हैं मुझे
मृत्यु से नही darna है मुझे
जीवन थो एक युद्ध हैं इसे लड़ना हैं muझे
नही मानव बनना है मुझे
एक नया इतिहास रचना है मुझे
