Tuesday, December 30, 2008

निर्माण एक नए समाज का

निर्माण एक नए समाज का
सागर सी गहरी हूँ, धरती सी विशाल हूँ।
दूब सी कोमल हूँ, चट्टान सी कठोर हूँ
कभी jawarbhatte की ऊंची उठती तरंग हूँ तो
कभी किसी jheel की सतह सी शांत हूँ।
कभी तपते आग का गोला हूँ तो कभी चंदरमा की शीतल चांदनी हूँ
कौन हूँ मैं- नही पहचाना मुझे
इस संसार का रचियता की सुन्दरतम रचना हूँ मैं
अरे मैं वामा हूँ, स्त्री हूँ, जननी हूँ
तीन बार मैं जनम लेती हूँ मैं
पहले माँ के गर्भ से बेटी के रूप में
फिर विवाह की वेदी पर पत्नी के रूप में
और फिर एक नयी रचना को जनम देते समय माँ के रूप में
par हाय रे vidambana Ram कृष्ण की जननी होते हुए भी
मेरे prarabdh में सिर्फ़ siskiyaan हैं कितनी tiraskrit हूँ मैं।
ये समाज और ये समाज के thekedar-क्यों मेरी sansoon पर pehra lagate हैं
बेटी रूप में pehchante ही गर्भ में मेरी हत्या क्यों करते हैं
कभी dahej की वेदी पर मेरी bali क्यों chadate हैं
माँ हूँ न सबकी फिर क्यों vridhawastha में
vridhashram की sidioon में chode चले आते हैं।
इतिहास को मैंने जनम दिया है, vartaman में भी मैं ही हूँ
bhavishay भी मेरे गर्भ में है तो फिर मैं क्यों shaktiheen हूँ।
पर नही अब और नही न jhoookoongi न tootoongi।
janti हूँ राह में biche हैं kaante, manzil तक pahunchna नही है assan
manzil तक पहुँचने के लिए ख़ुद पाँव badana होगा।
roshni पाने के लिए मुझे ख़ुद को jalana होगा
shaktipunj हूँ मैं एक नए समाज का निर्माण करना होगा
karoongi--karoonti.....मैं एक ऐसे नए समाज का निर्माण
jahan मेरी पूजा होगी, jahan विश्वास होगा jahan प्यार होगा
यह मत bhoolna तुम मैं naari हूँ
न haari हूँ मैं कभी---न haroongi कभी.

Friday, May 16, 2008

यह कविता मैंने अपनी एक कलिग की विदाई पार्टी में सुनायी थी । ११ अप्रिल को - इस दिन मेरा जन्मदिन भी होता है इसीलिए मुझे यह दिन हमेशा याद रहेगा।

बीते लम्हे कुछ यूं याद आ रहे हैं
गुजरे तीन दशक आंखों मी समाये जा रहें हैं।
इन गलियारों में खड़े होकर सखियों संग बतियाना
कैंटीन मी बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ खिलखिलाना
गर्मियों के दुपहरी में कमरे में बैठकर सुस्ताना
सर्दियों की कुंकुनी धुप में बैठकर मूंगफली खाना
सब कुछ याद आ रहे हैं
गुजरे तीन दशक आंखों में समाये जा रहे हैं।
पल पल करते कितने ही पल बीत गए
कल कल करते ६० वर्ष बीत गए
कभी किसी से कुछ कहा तोः किसी से सुना भी
किसी को कुछ दिया तोः बहुत कुछ पाया भी
वो प्यार, वो सम्मान , वो अपनापन सब याद आ रहे हैं।
गुजरे तीन दशक आंखों में समाये जा रहे हैं।
क्या कहे आपसे कुछ कहने के काबिल नही
आपसे बस इतना कहना चाहते हैं के
ख़ुद को ख़ुद से कैसे भुला पाओगे
अपनी पहचान कैसे भुला पाओगे
अंधेरों में जब भी जाओगे तुम
अपने साथ हमे पाओगे तुम।

Wednesday, May 14, 2008

यह कविता मैंने अपनी बिटिया के लिए लिखी जब उन्हें अपने विधालय में पर्यावरण पर कुछ बोलना था।

एक पथिक दूर से आता दिखता है
आंखो में तलाश, होंटों पे प्यास
शीतल तरुवर की छाया में दूर तक नज़र दौड़ता है।
चारों ओर ठूंट ही ठूंट ही सूखी ज़मीन पाता है ।
थके क़दमों से अपनी मंजिल की ओर बढता चला जाता है ।
देखा--- यही है भाविशेय हमारे देश का
यूँही वृक्ष काटोगे धरती को बंज़र बनाओगे
तो हरियाली कहाँ से पाओगे
भूल गए हैं हम एक ही वृक्ष से तो और वृक्ष बनते हैं
फल, फूल, लकड़ी सब कुछ ही तो पाते हैं
फिर भी हम इनको काटे चले जाते हैं।
बस इतना याद रखना है
एक और वृक्ष लगाना हैं हरियाली को बचाना हैं
वो चंदन की सुगंध, वो अम्बियो के महक तभी तो पाओगे
जब एक वृक्ष लगाओगे
यही एक नारा याद रखना हैं
एक और वृक्ष लगाना है
देश को बचाना है.

Friday, May 09, 2008

कब तक छलते रहोगे
कब तक तुम मुझे छलते रहोगे
बोलो कब तक तुम मुझे छलते रहोगे
हर युग में तुम मुझे छलते रहे।
सीता बन अग्नि परीक्षा दी मैंने
तुम्हे मर्यादा पुरषोत्तम बनाया किसने ?
बोलो मर्यादा पुरषोत्तम बनाया किसने?
गोपी बना विरह अग्नि में जलाया किसने?
राधा बना बंसी की धुन पर नचाया मुझे
बोलो योगिराज कृष्ण किसने बनाया तुम्हे?
नन्हें राहुल को सीने से लगा बहलाया मैंने
रो रो कर एकाकी जीवन बिताया मैंने
बोलो गौतम बुध किसने बनाया तुम्हे?
तुम्हारे द्वारा बार बार छले जाने पर भी
मैं हताश नही हूँ, मैं निराश नही हूँ।
क्योंकि मैं जानती हूँ की हर युग को एक मर्यदावादी राम चैएये
हर युग को योगिराज कृष्ण चिएये
इसीलिए हर युग मी तुम्हारे द्वारा छले जाना मुझे अंगीकार है
बोलो तुम कब तक मुझे छलते रहोगे?
बोलो कब तक तुम मुझे छलते रहोगे?

Thursday, May 08, 2008

नवजीवन

ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे

पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी

वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक

दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी

शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था

के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया

दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,

हवा ने पूरी ताकत लगाई

पर दिए को बुझा न पाई

मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर

विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी

मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ

जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा

मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी

दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी

सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था

और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी

नई डगर पर..............

Sunday, April 20, 2008

तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता

तेरे शहर मे आस्मान को छूती इमारते है

चमचमाती कारें हैं, सरसराती सड़कें हैं

तेरा शहर बड़ा ही सजीला है, बड़ा रंगीला है

फिर भी मेरा दिल यहाँ नही लगता

क्योंकि तेरा शहर इंसान को निगल गया है।

इंसानियत यहाँ दर दर भटक रही है

पर उसे तेरे शहर मे पनाह नही मिलती

सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं

इसिस्लिएय मेरा दिल यहाँ नही लगता।

तेरे शहर मे सजे सवारे ड्राइंग रूम हैं, आरामदायक बेडरूम हैं

पर उसमे रहने वालों को पल भर भी सकूं नही है

इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।

दम तोड़ते बाप की खावीश है की kucch पल बेटा मेरा हाथ थामकर बैठे

वृधाश्रम के बिस्तर पर लेती माँ की खावैश है के बच्चों को आँचल मे चुप कर रो ले,

पर बच्चों के पास इन बेमानी बातों के लीये वक्त नही है

इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।

याद आता है मुझे अपना छोटा सा शहर

जहाँ धूल भरी कच्ची सड़कें हैं, छोटे छोटे घर हैं पर बड़े बड़े आँगन हैं

आँगन मे गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठी माँ नज़र आती है

जो आज भी स्वेटर न पहनने पर बाबूजी को दंत लगाती है

ज़रा सी हरारत होने पर माँ मेरे सिरहाने बैठ रात आंखों मे काटती है

काश तेरा शहर भीऐसा हो जाए

जहाँ इंसान के हसियत की नही इंसानी रिश्तों की कदर हो

आंखों मे प्यार का समुंदर हो, सीने मे धड़कता हुआ दिल हो

फिर तेरे शहर मे कोई फर्क नही रह जाएगा

फिर मेरा दिल तेरे शहर मे लग जाएगा.

Sunday, March 30, 2008

मेरा अक्स (पहचान)

मेरी ज़िन्दगी कुहासे में लिपटी जैसे
जिसके पार मैं शायद कुछ देखने का यतन कर रही हूँ
कुछ अस्पष्ट सी आकृतियाँ या शायद किसी
शख्स की शक्सियत मेरे जेहन में धुंएँ के समान उड़ रही है
कुहासे के उस पार मैं कुछ देख रही हूँ
शायद अपना बीता हुआ कल- नही उसकी चुभन तो मैं भूल चुकी हूँ
या शायद अपना आज- नही नही वो तो किसी अनदेखे व्यक्तित्व में कल को ढूँढ रहा है
तो फिर शायद अपना भविष्य
जो उस कुहासे की चादर के पीछे किसी बच्चे की तरह झांक रहा है
ये क्या है......?
देखो कोहरा छंट रहा है और कोई सूरत अख्तियार कर रहा है
अरे....ये तो मेरे ही जिस्म का टुकडा है
जिसे मैंने ही जनम दिया है
इसी अनदेखे व्यक्तित्व में तो मैं अपना
कल आज और कल ढूँढ रही थी
देखो देखो सूरज की पहली किरण मेरे इस नन्हे अस्तित्व पर पड़ी
तुमने देखा कुछ....?
हाँ! हम दोनों ही दूर शितिज की तरफ़ बड़े जा रहे हैं
अपने अनदेखे अनजाने आने वाले
कल को सूरज की इस स्वर्णिम किरण की भांति
अपने आज को आलोकित करने .


Thursday, March 13, 2008

paribasha insaan ke

कुछ कहा तुमने मुझे ? एक इंसान कहा ?
क्या मैं इंसान हूँ ?
ठीक है, मैं हाध मांस का बना हूँ
sआवासों मे जीता हूँ, पर क्या मैं फिर भी इंसान हूँ।
नही॥ मैं इंसान नही एक हैवान हूँ शायद
- मैंने खड़ी की दीवार धरम की
मैंने ही गया राग जाति ka
भाषा को बनाया एक हथियार
पानी को भी बांटा मैंने हर बार

-नही देखी मैंने किसी मासूम के हँसी
छीनी मैंने अधरू से किसी नव्योवना की हँसी
नही सुनी मैंने किसी विधवा माँ kee हँसी
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ
कल जालिअवालन बाग़ आज अक्षरधाम
कल कोई टूटी मस्जिद
मेरी ही टू देन है
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
- ये उजधता चमन वो मसली कालेi
वो bइलाखता बचपन इसका रचियता मैं ही टीoh हूँ
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भुला दिया मैंने ये देश है गौतम गाँधी का
जहाँ बहती थी कभी दूध के नदियाँ
वहाँ बहाई हैं मैंने खून के नदियां
फिर भी कहते हो मैं इंसान हूँ।
भूल गया मैं - माली चमन ujadta नही
फूल सुगंध लेता नही, nadi neer peeti नही
- नही अब और नही
बस इतना याद रखना हैं मुझे
मृत्यु से नही darna है मुझे
जीवन थो एक युद्ध हैं इसे लड़ना हैं muझे
नही मानव बनना है मुझे
एक नया इतिहास रचना है मुझे