निर्माण एक नए समाज का
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kuch khas nahi hai mere baare me.
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नवजीवन
ज़िंदगी से निराश मैं एक अनजान अन्धिआरे
पथ पर बढ़ी जा रही थी प्रकृति कुछ खामोश सी थी
वह भी शायद मेरे ढूखों मी भागीदार थी के अचानक
दूर कहीं अंधेरे मी एक दिए के लौ टिमटिमाती दिखाई दी
शीन प्रकाश चारों और फ़ैल कर अन्धकार से टक्कर ले रहा था
के जोर से बिजली कड़की, हवा का एक तेज झोंका आया
दिए की लौ कुछ थर्थाराई, कुछ कन्प्कंपयी,
हवा ने पूरी ताकत लगाई
पर दिए को बुझा न पाई
मैं अवाक खड़ी देखती रही एक नन्हें से दिए का अस्तितत्व बोध देखकर
विचारों के बवंडर मैं उतरने चढ़ने लगी
मैं टू एक मानव हूँ फिर भी जीवन से निराश हूँ
जीवन टू एक युद्ध है इसे लड़ना ही होगा
मैं भी अपने अस्तित्व के लिए ladhoongi और जीत कर धिखूंगी
दिए के लौ अब मेरे दिल में जल रही थी
सुबह का प्रकाश चारो और फ़ैल रहा था
और दृढ़ कदमों से मैं चल दी एक अनजान अनदेखी
नई डगर पर..............
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तेरे शहर मे आस्मान को छूती इमारते है
चमचमाती कारें हैं, सरसराती सड़कें हैं
तेरा शहर बड़ा ही सजीला है, बड़ा रंगीला है
फिर भी मेरा दिल यहाँ नही लगता
क्योंकि तेरा शहर इंसान को निगल गया है।
इंसानियत यहाँ दर दर भटक रही है
पर उसे तेरे शहर मे पनाह नही मिलती
सबने अपने दरवाजे बंद कर लिए हैं
इसिस्लिएय मेरा दिल यहाँ नही लगता।
तेरे शहर मे सजे सवारे ड्राइंग रूम हैं, आरामदायक बेडरूम हैं
पर उसमे रहने वालों को पल भर भी सकूं नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
दम तोड़ते बाप की खावीश है की kucch पल बेटा मेरा हाथ थामकर बैठे
वृधाश्रम के बिस्तर पर लेती माँ की खावैश है के बच्चों को आँचल मे चुप कर रो ले,
पर बच्चों के पास इन बेमानी बातों के लीये वक्त नही है
इसी लिए तेरे शहर मे मेरा दिल नही लगता।
याद आता है मुझे अपना छोटा सा शहर
जहाँ धूल भरी कच्ची सड़कें हैं, छोटे छोटे घर हैं पर बड़े बड़े आँगन हैं
आँगन मे गुलमोहर के पेड़ के नीचे बैठी माँ नज़र आती है
जो आज भी स्वेटर न पहनने पर बाबूजी को दंत लगाती है
ज़रा सी हरारत होने पर माँ मेरे सिरहाने बैठ रात आंखों मे काटती है
काश तेरा शहर भीऐसा हो जाए
जहाँ इंसान के हसियत की नही इंसानी रिश्तों की कदर हो
आंखों मे प्यार का समुंदर हो, सीने मे धड़कता हुआ दिल हो
फिर तेरे शहर मे कोई फर्क नही रह जाएगा
फिर मेरा दिल तेरे शहर मे लग जाएगा.